श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है मातृ दिवस पर विशेष “कहाँ हो माँ? ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ ☆
🌻कविता 🌻 कहाँ हो माँ? 🌻
(विधाता छंद)
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कहाँ हो माँ जरा सुन लो, तुम्हारी याद आती है।
घड़ी भर नींद का झोका, लगा आँचल सुलाती है।।
बजे धड़कन जरा सुन लो, अभी आँखे भरी मेरी।
यहीं है माँ तुझे देखूँ, लगे आवाज है तेरी।।
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बनी दुनिया यहाँ मेरी, नया अनुभव सभी पाया।
बिताया फूल सा जीवन, सदा आँचल बनी छाया।।
समय की मार भी देखा, खड़ी हर जुल्म से सीखा।
कहीं बातें सदा मीठी, सही बातें बड़ी तीखा।।
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ह्दय में प्रेम की गंगा, सदा ममता भरी बोली।
सजाया है यही घर को, कहे दुनिया बड़ी भोली।।
भरी है मांग लाली से, सजी कंचन सदा गहना।
पिता के साथ देखी है, सदा ही संग में बहना।।
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सुनाती लोरियाँ मीठी, लगा बचपन अभी आया।
पुरानी बात है सारी, तुझे ढूँढा नही पाया।।
बनी जो हाथ की रोटी, सदा मुँह स्वाद है मेरा।
बनाई माँ मुझे बिटिया, करूँ आभार मै तेरा।।
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विधाता खेल है रचता, लिखी हूँ आज मै गाना।
कहाँ ढूँढूँ तुम्हें मै तो, जरा मुझको बता जाना।।
मिली है प्रेम की पाती, यही तेरी निशानी है।
बता तुझको लिखूँ कैसे, सभी बातें कहानी है।।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






