श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
झाँसी घाट से सतधारा घाट
नर्मदा अमरकण्टक से निकलकर डिंडोरी-मंडला से आगे बढ़कर पहाड़ों को छोड़ दो पर्वत ऋंखलाओं दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में कैमोर से आते विंध्य के पहाड़ों के समानांतर दस से बीस किलोमीटर की औसत दूरी बनाकर अरब सागर की तरफ़ कहीं उछलती-कूदती, कहीं गांभीर्यता लिए हुए, कहीं पसर के और कहीं-कहीं सिकुड़ कर बहती है। उसके अलौकिक सौंदर्य और आँचल में स्निग्ध जीवन के स्पंदन की अनुभूति के लिए पैदल यात्रा पर निकलना भाग्यशाली को नसीब होता है। यह यात्रा कुछ समय के वानप्रस्थ प्रवास द्वारा सभ्रांत मोह से मुक्ति का अभ्यास भी है। जिस नश्वर संसार को एक दिन अचानक या रोगग्रस्त होकर छोड़ना है क्यों न उस मोह को धीरे-धीरे प्रकृति के बीच नर्मदा के तटों पर बिखरे अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करते हुए छोड़ना सीख लें।
पीछे टाँगने वाले हल्के बैग में एक जींस या पैंट के साथ फ़ुल बाहों की तीन शर्ट, एक शाल, तोलिया और अंडरवेयर, साबुन तेल रखकर, वैसे तो आश्रम और धर्मशालाओं में भोजन की व्यवस्था हो जाती है फिर भी रास्ते में ज़रूरत के लिए समुचित मात्रा में खजूर, भूनी मूँगफली, भुना चना और ड्राई फ़्रूट, पानी की बोतल और एक स्टील लोटा-गिलास के साथ एक छोटा चाक़ू भी रख समर में उतर पड़े। कहीं कुछ न मिले तो परिक्रमा वासियों का मूलमंत्र “करतल भिक्षु-तरुतल वास” आज़माना जीवन का एक विलक्षण अनुभव है।
हमारा नर्मदा परिक्रमा समूह एक अनौपचारिक समूह है जो नर्मदा परिक्रमा शुरू करने के आसपास मिलता है और बिखर जाता है। हम लोग समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) के आधारभूत सिद्धांत पर अमल करते हुए स्वाभाविक रूप से एक दूसरे का ध्यान रखते हैं। समूह में सदस्यों की भूमिका सहज ही विकसित हो गई है कि कौन क्या करेगा जैसे निधि कोष बनाकर ख़र्च करने की ज़िम्मेदारी अरुण भाई की निर्धारित हो गई है, अविनाश भाई फ़ोटो खान-पींन, मुंशीलाल भाई जुगाड़ु कार्य अच्छी तरह कर लेते हैं। प्रयास भाई और मुंशीलाल भाई वरिष्ठ यात्री जगमोहन अग्रवाल का ध्यान रखते चलते हैं। जगमोहन भाई पूजा-पाठ करते हैं।
समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) की मनोवैज्ञानिक अवधारणा आपसी व्यवहार और व्यवहार पैटर्न से संबंधित है। समूह की गतिशीलता चिंता करती है कि समूह कैसे बनते हैं, उनकी संरचना क्या है और उनके कामकाज में किन प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। इस प्रकार, यह समूहों के बीच संचालित होने वाली बातचीत और भूमिका से संबंधित है। एक समूह दो या दो से अधिक लोगों से मिलकर बनता है। जो सामान्य उद्देश्य अर्थात हमारे मामले में नर्मदा परिक्रमा साझा करते हैं और स्वयं का मूल्यांकन करते हैं और सामान्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक साथ आते हैं। दूसरे शब्दों में, एक समूह उन लोगों का इकट्ठा होना है जो एक दूसरे के साथ बातचीत करते हैं; अधिकारों और दायित्वों को सदस्यों के रूप में स्वीकार करके एक समान पहचान साझा करते हैं। समूह विकास चार चरणों की एक गतिशील प्रक्रिया है। समूह कैसे विकसित होते हैं? यह एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समूह गुजरते हैं। प्रक्रिया में चार चरण शामिल हैं: गठन, तूफान, सामान्यीकरण, प्रदर्शन।
समूह के जीवन में पहला चरण एक समूह बनाने से संबंधित है। इस चरण में सदस्यों को या तो कार्य आवंटन या अन्य लाभ, जैसे स्थिति, संबद्धता, शक्ति, भूमिका आदि की तलाश होती है। इस स्तर पर सदस्य या तो किसी प्रकार की गतिविधि में संलग्न होते हैं या उदासीनता दिखाते हैं। कुछ सक्रिय, कुछ बहुत सक्रिय और कुछ उदासीन रहते हैं।
समूह में अगला चरण विगठन के लक्षण प्रदर्शित करना है। सदस्य आपस में परिचित या समान व्यक्तियों की तलाश करते हैं और स्वयं की गहन साझेदारी शुरू करके समूह के अंदर उपसमूह का निर्माण करते हैं। उपसमूह, समूह में एक भेदभाव पैदा करता है और तनाव दिखाई दे सकता है। पेयरिंग एक सामान्य घटना है। समूह को नियंत्रित करने के बारे में संघर्ष होगा।
हर समूह को परिपक्वता प्राप्त करने के लिए तूफ़ान से गुज़रना होता है। तूफ़ान के दौर में अक्सर सदस्य समूह से अलग होने की सोचने लगते हैं। समूह बिखराव का अंदेशा इसी समय अधिक होता है। हमारे समूह में भी तूफ़ान पैदा हुआ जब अरुण-अविनाश का उपसमूह अविनाश का उनके रिश्तेदार होने से बन गया, दूसरा उपसमूह जगमोहन-प्रयास का इसलिए बना कि प्रयास जगमोहन को बैग टाँगने और पैदल चलने में सहयोग कर उनके साथ चल रहे थे। समूह में हम और मुंशीलाल अकेले बचे लेकिन जब समूह में उपसमूह बनते हैं तब अकेले रह गए लोगों का स्वभाविक समूह बन जाता है। थकान और भूख की झुँझलाहट कई रूप में निकलती है। ऐसे में दो उपसमूह द्वारा मुंशीलाल पर आक्रामक होने लगे, अविनाश, प्रयास और जगमोहन कई बार उनसे तेज़ स्वर में पेश आने लगे। अविनाश भाई ने उन्हें चाय बनाने के लिए सामान निकालने में पोलीथीन की आवाज़ करने पर दो-तीन बार टोंका जबकि वे सबके लिए चाय बनाने की तैयारी कर रहे थे। प्रयास भाई ने फ़ोटो निकालते समय दो बार झिड़का। जगमोहन भाई ने समनापुर में भोजन के लिए बैठने को लेकर मुंशीलाल भाई को बुरी तरह डाँटा। तब हमने मुंशीलाल जी को शांत रहने का मशवरा दिया क्योंकि समूह बिखरने का अंदेशा उसी समय सबसे अधिक था। उपसमूह बनने पर सदस्य अपनी कुंठा अकेले पड़ गए सदस्य पर उतारने लगते हैं।
समूह के विकास का तीसरा चरण कार्य प्रदर्शन के बारे में अधिक गंभीर चिंता से चिह्नित होता है। अनौपचारिक समूह में नेतृत्व उभर कर समूह में अन्य सदस्यों को खोलना शुरू कर देते हैं। कार्य प्रदर्शन के लिए विभिन्न मानदंडों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। सदस्य अपने स्वयं के समूह और संबंधों के लिए अधिक जिम्मेदारी लेना शुरू करते हैं, एक बार यह चरण पूरा हो जाने के बाद, नेतृत्व पदानुक्रम के बारे में एक स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। समूह संरचना के ठोसकरण और समूह की पहचान और दूरदर्शिता की भावना के साथ होती है।
प्रदर्शन पूरी तरह कार्यात्मक समूह का एक चरण है जहां सदस्य खुद को एक समूह के रूप में देखते हैं और कार्य में शामिल होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति योगदान देता है, समूह की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए समूह के मानदंडों का पालन किया जाता है और सामूहिक दबाव डाला जाता है। अब समूह में एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जैसा आप अपने लिए पसंद नहीं करते, सिद्धांत का पालन होने लगता है। समूह अपने लक्ष्यों को पुनर्परिभाषित कर सकता है बाहरी वातावरण से जानकारी के प्रकाश में और उन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक स्वायत्त इच्छाशक्ति दिखाएगा तब ही समूह की दीर्घकालिक व्यवहार्यता स्थापित और पोषित हो सकती है। समूह के सदस्यों की जानकारी बहुत काम की होती है।
अनौपचारिक समूह हमेशा विजातीय (heterogeneous) ही होते हैं। अमेरिका में Deniel Goleman के Emotional Intelligence सिद्धांत प्रतिपादन उपरांत “व्यवहार-विज्ञान” से समूह गतिशीलता पर अनेकों खोज, सर्वे और अनुसंधान हुए तदानुसार मुख्यतः चार प्रकार के व्यवहार पहचाने गए।
मौलिक व्यवहार (Natural Behaviour)
अंगिकृत व्यवहार (Adopted Behaviour)
पारदर्शी व्यवहार (Transparent Behaviour)
नकारात्मक व्यवहार (Negative Behaviour)
दिल में अंदर कुछ है लेकिन कुछ और प्रदर्शित किया जा रहा है। एक ग़ज़ल के मुखड़े से इसे समझ सकते हैं।
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो।
*
ओंठों पे हँसी आँखों में नमी
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो।
यह अंगिकृत व्यवहार है, जिसे हम से हर कोई बैंक या आफिस पहुँचते ही ओढ़ लेते हैं। अकसर लोग अंगिकृत व्यवहार के आदी हो जाते हैं, सेवनिवृत्ति के बाद भी अपने स्वभाविक व्यवहार में नहीं आते। स्वभाविक व्यवहार में आने के लिए दोस्तों की खुली महफ़िल दरकार होती है और जब उसमें गांधी-सावरकर जैसे विवाद बीच में आ जाते हैं तब दोनों तरफ़ से नकारात्मक व्यवहार शुरू होता है, एक चुप नकारात्मकता के साथ बातचीत स्थगित हो जाती है। जगमोहन भाई और अरुण भाई के व्यवहार पारदर्शी स्वभाव के उदाहरण हैं, जो दिमाग़ में होता है वह सहजता से प्रदर्शित करते हैं। इससे बचना समूह के अच्छे परिचालन के पक्ष में होशियारी होगी। दो यात्राओं में सदस्यों के आधारभूत व्यक्तित्व ज्ञात हो गए हैं अब समूह मज़बूती ग्रहण करेगा। इसकी क्या गारंटी है कि किसी सदस्य की जगह कोई नया आएगा वह इनसे अच्छा होगा। समूह में अच्छा या बुरा होता भी नहीं है। हर व्यक्ति कुछ विलक्षणता और कुछ ख़ामियाँ जन्मजात लिए होता है, पाँच साल की उम्र तक इदम (Id) में और 18 साल की उम्र तक अहम (Ego) में विकसित होते हैं, जिन्हें बाद में बदला नहीं जा सकता है। अतः मनुष्य जैसा है वैसा ही स्वीकार्य करने से समूह गतिशीलता (Group Dynamic) ठीक तरह काम करती है।
हम सभी परिक्रमा वासियों में जगमोहन अग्रवाल सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन वे सबसे ज़्यादा मज़बूती और जूझारूपन से यात्रा में भाग लेते हैं। उनके पैरों में तकलीफ़ है इसलिए घुटने ज़मीन पर टेककर पंद्रह किलो का भार सहित खड़े हो पाते हैं। अन्य शारीरिक दिक़्क़तों के बावजूद वे निरंतर यात्रा करते रहे। उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि वे परेशानी में हैं, नर्मदा जी में उनकी आस्था प्रबल है। नरसिंहपुर जिले की गाड़रवाडा तहसील के कौंडिया ग्राम के मूल निवासी हैं। जहाँ कभी कौंड़िल्य ऋषि का आश्रम हुआ करता था। जीवंतता, जीवटता और जूझारूपन उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। जगनमोहन जी ट्रेकिंग के बहुत ही शौकीन रहे हैं। बैंक नौकरी में भी यूथ क्लब की ओर से अकसर जाते रहते थे।
अरुण दनायक के पिताजी का नाम रेवाशंकर है, वे पुत्री रेवा और पिता शंकर दोनों का आशीर्वाद लेकर चलते हैं। उनके पिताजी रेल्वे में अधिकारी थे। उनकी माताजी 1930-40 के दशक की सुशिक्षित महिला थीं, वे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर स्त्री शिक्षा और कलात्मक अभिरुचि की गतिविधियों से जीवन भर जुड़ी रहीं। वे रोज़ मोतीदाना अक्षरों में डायरी लिखती थीं। इन्होंने वे डायरियाँ संभाल कर रखीं हैं जिनमे तीस से साठ के दशक का इतिहास और मुख्य-मुख्य घटनाओं का विवरण मिलता है। अरुण दनायक को लेखन के संस्कार माताजी से मिले हैं। वे गांधी जी से भावनात्मक स्तर पर गहराई से प्रभावित है। किसी काम को सौम्यता से पूरा करने की ज़िद उन्हें अच्छा परिक्रमा वासी बनाती है।
अविनाश दवे सेंट्रल बैंक से सेवानिवृत्त हैं, जबलपुर सेवानिवृत्त संघ की गतिविधियों से जुड़े हैं। अविनाश स्वादिष्ट भोजन प्रेमी हैं। यह गुण उन्हें उनके माता व पिता से विरासत में मिला है। अविनाश के बैग का एक खंड खाद्य सामग्री से भरा है। उसके पास चाय काफी से लेकर पोहा, नमकीन, अचार, मैगी मसाला लड्डू सब मिल जायेगा। अविनाश शौक़ीन फ़ोटोग्राफ़र हैं उनके केमरा से उतारीं गईं फ़ोटो की गुणवत्ता कलात्मक होती है।
मुंशीलाल पाटकर पेशे से वक़ील हैं लेकिन मिज़ाज से यायावर प्रकृति के हैं, हर दो-तीन महीनों में पर्यटन पर निकल जाते हैं। वे बहुमुखी जुगाड़ प्रतिभा के धनी हैं, बीच जंगल में चाय की जुगाड़ जैसी कई जुगाड़ से वाक़िफ़ हैं। समूह के ये त्यागी पुरुष पूरी यात्रा में गरम कपड़े दरी टोपा मोज़े सब दान करते आए। ख़ाली बैग में करेली से एक-एक किलो गुड़ और तुअर दाल भर लाए।
प्रयास जोशी एक संवेदनशील कवि और कला जगत से जुड़ाव रखने वाले दार्शनिक क़िस्म के शांत इंसान हैं। कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में गराऊ घाट पर उनकी रचनाओं का रसपान किया। वे ट्रैकर हैं, यूथ होस्टल की गतिविधियों से जुड़े हैं।
नर्मदा परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में से दुरुह यात्रा है। हिंदू हज़ारों सालों से इस यात्रा को करते आ रहे हैं। इस यात्रा के सामने डिस्कवरी चैनल की नक़ली साहसिक यात्राएँ कहीं नहीं लगतीं क्योंकि उनमें ड्रोन केमरा, सैटलायट इमेज, फ़ोटो ग्राफ़र दल और सपोर्ट के रूप में मेडिकल टीम साथ चलते हैं, उनके पास बेहतरीन जीवन रक्षक दवाएँ और आकस्मिक जोखिम से निपटने के अस्त्र होते हैं। नर्मदा यात्रा का कोई तैयार रास्ता नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वर्ष नर्मदा के भीषण प्रवाह में सारे किनारे कट कर रास्तों को धो डालते हैं। नर्मदा तेज़ बहाव से कहीं किनारों को तोड़ डालती है, कहीं कँपा छोड़ जाती है, कहीं किसान कछारी खेतों को बखर कर पैदल चलना दूभर कर देते हैं, कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई के कारण कीचड़ से सने खेतों में क़दम रखने से ऐडी तक पैर गंपते हैं, कहीं नुकीली धारदार पहाड़ी पर चलना ठीक वैसा ही है जैसे खड़ी दीवार पर छिपकली जैसे पैर जमाकर खिसकना, कहीं पहाड़ी नालों की गहराई को फिसल कर पार करना। परिक्रमा पथ पर पड़ने वाले स्थानों की दूरी का किताबों में लिखी दूरियों से कोई मेल नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इनको नाप कर नहीं अपितु अन्दाज़ से कोस, मील या किलोमीटर में बताया गया है जो कि भ्रामक है। वे किलोमीटर मील भी हो सकते हैं या कोस भी हो सकते हैं। हम आई-फ़ोन से नाप कर सही दूरियाँ लिखते गए हैं। भोजन और ठहरने की व्यवस्था का कोई ठिकाना नहीं, ऐसी विषम परिस्थितियों में नौ दिनों में 104 किलोमीटर की पदयात्रा शरीर को मरोड़ कर और मन के सारे अहंकार तोड़ कर रख देती है। इसके सामने यूथ होस्टल की ट्रैकिंग बच्चों का मन बहलाव है। इस 9 दिवसीय कमरतोड़ 163571 क़दम की यात्रा के दौरान जिन आश्रमों और उनके स्वामियों संचालकों ने आश्रय और भोजन दिया वे साधुवाद के पात्र हैं।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




