श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “मेरा साया” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १६० ☆
☆ मेरा साया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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जब भी देखा दर्पन मैंने
मैं ही नज़र आया
मुझसे ही घबराया पल-पल
मेरा ही साया।
तृष्णा मरी
न मरा अहम
बिछा मोह सोया
मैली चादर
धोयी मन का
मैल नहीं धोया
करता रहा सवाल स्वयं से
जब भी भरमाया।
झूठ चाल
शकुनि के जैसी
सत्य युधिष्ठिर सा
भरी सभा में
मौन खड़ा है
धर्म निरुत्तर-सा
अट्टहास करता दु:शासन
जनमन थर्राया।
रामराज्य की
सुगढ़ कल्पना
बाट जोहता मन
मर्यादा की
लाँघ देहरी
सब संकल्प हवन
निर्वासित सा जीवन जीते
निशाचरी माया।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
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