डॉ. ऋचा शर्मा

(हम  डॉ. ऋचा शर्मा जी  के ह्रदय से आभारी हैं जिन्होंने हमारे  सम्माननीय पाठकों  के लिए “साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद” प्रारम्भ करने के हमारे आग्रह को स्वीकार किया. डॉ ऋचा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  मिली है.  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं.  अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे. आज प्रस्तुत है उनकी ऐसी ही एक लघुकथा “अम्माँ को पागल बनाया किसने?”)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 1 ☆

 

☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने ?  ☆ 

 

“भाई! आज बहुत दिन बाद फोन पर बात कर रही हूँ तुमसे। क्या करती बात करके? तुम्हारे पास बातचीत का सिर्फ एक ही विषय है कि ‘अम्माँ पागल हो गई हैं’। उस दिन तो मैं दंग रह गई जब तुमने कहा – अम्माँ बनी-बनाई पागल हैं। भूलने की कोई बीमारी नहीं है उन्हें।”

“मतलब” – मैंने पूछा

“जब चाहती हैं सब भूल जाती हैं, वैसे फ्रिज की चाभी ढूँढकर सारी मिठाई खा जाती हैं। तब पागलपन नहीं दिखाई देता? अरे! वो बुढ़ापे में नहीं पगलाई, पहले से ही पागल हैं।”

“भाई! तुम सही कह रहे हो – वह पागल थी, पागल हैं और जब तक जिंदा रहेगीं पागल ही रहेंगी।अरे! आँखें फाड़े मेरा चेहरा क्या देख रहे हो? तुम्हारी बात का ही समर्थन कर रही हूँ।” ये कहते हुए अम्माँ के पागलपन के अनेक पन्ने मेरी खुली आँखों के सामने फड़फड़ाने लगे।

“भाई! अम्माँ का पागलपन तुम्हें तब समझ में आया जब वह तुम्हारे किसी काम की नहीं रह गई, बोझ बन गई तुम पर | पागल ना होती तो मोह के बंधन काटकर तुम पति-पत्नी को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया होता। तुम्हारी मुफ्त की नौकर बनकर ना रहतीं अपने ही घर में। सबके समझाने पर भी अम्माँ ने बड़ी मेहनत से बनाया घर तुम्हारे नाम कर दिया। कुछ ही समय में उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था।  इसके बाद भी ‘मेरा राजा बेटा’ कहते उनकी जबान नहीं थकती, पागल ही थीं ना बेटे-बहू के मोह में? जब जीना दूभर हो गया तुम्हारे घर में तब मुझसे एक दिन बोली – ‘बेटी! बच्चों के मोह में कभी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी ना मार बैठना, मेरी तरह। मैं तो गल्ती कर बैठी, तुम ध्यान रखना।”

“भाई! फोन रखती हूँ। कभी समय मिले तो सोच लेना अम्माँ को पागल बनाया किसने??”

 

© डॉ. ऋचा शर्मा,

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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Prabha Sonawane
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दिल को छू लेने वाली लघुकथा ।

Prabha Sonawane
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दिल को छू लेने वाली लघुकथा

सोपान दहातोंडे
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कटू यथार्थ , आधुनिक युग में वृध्दों की वास्तविक समस्या को सटीक व्यंग के साथ दर्शाती लघुकथा। पारिवारिक जीवन में संतानों के स्वार्थ एवं कपट भरे व्यवहार के भी दर्शन होते हैं लघु कथा पाठक को सोचने पर विवश कर देती हैं । परिवार में युवाओं को उनके व्यवहार के प्रति आईना दिखाने वाली रचना है।

Suraj
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रिश्ते प्यार से बनते हैं। स्वार्थ से नही। जिनमे प्रेम की समझ नहीं, ऐसे मनुष्य इसी प्रकार व्यवहार करते हैं। बहुत सुंदर लघु कथा। लेखक को प्रणाम।

Ekta Thadani
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Ma’am aap sachme expert hain, lagukathaein likhne me…. Ye wali bhi bhot sundar hai… Puri chhavi dimag me ban rahi thi…

Dr. Nanasaheb Jawale
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बहुत ही प्रासंगिक लघुकथा है, जो वर्तमान पारिवारिक समस्या व्यक्त करती है. बच्चो में बढती असंवेदनशीलता चिंता का विषय बन रहा है. आज की संतान स्वार्थी बनती जा रही है. आता उनके साथ सजग रहकर व्यवहार करना चाहिए भावना में बहकर खुद के पैरों पर कुल्हाडी नहीं मारनी चाहिये . मां का यह संदेश महत्त्वपुर्ण है.

Dr. Nanasaheb Jawale
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बहुत ही प्रासंगिक लघुकथा है, जो वर्तमान पारिवारिक समस्या अभिव्यक्त करती है. बच्चो में बढती असंवेदनशीलता चिंता का विषय बन रहा है. आज की संतान स्वार्थी बनती जा रही है. अब उनके साथ सजग रहकर व्यवहार करना चाहिए भावना में बहकर खुद के पैरों पर कुल्हाडी नहीं मारनी चाहिये . मां का यह संदेश महत्त्वपुर्ण है.

Sanjay Bhardwaj
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घर-घर की विराट कलेवर वाली लघुकथा।

Chetan Vishnu Raveliya
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अतिशय संवेदनशील विषय उठाया है | सुंदर अभिव्यक्ति

prashant dhage
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Very nice man

चारू गुप्ता
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कड़वा सच है ये कहानी?

चारू गुप्ता
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समाज के सच को दिखाती है ये कहानी?

वैष्णव पी. वी
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समकालीन तथा अत्यंत हृदय स्पर्शी रचना।