सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ गिरते हैं शहसवार ही— ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

ऐ जी !सुनते हो 15 दिन में बारह पुल गिर गये। तीन दिन से घिसे हुये रेकार्ड की तरह एक ही खबर सुनाये जा रहे हो।  13 वें  पुल की कोई खबर भी है ?

–क्यों क्या हुआ ?

–वह भी गिर गया।

–देखो भागवान ! सब प्रभु की माया है। पुल ऐसे गिरे या वैसे। आधा गिरे या पूरा। सूखी नदी में गिरे या पानीवाली में। तुमसे पूछकर गिरेगा क्या ?उसे गिरना था गिर गया।

गिरने पर मानव का ही एकाधिकार है क्या !स्पर्धा और रफ्तार का जमाना है। रेस में अव्वल आने की कामना किसमें नहीं होती। पुल अपवाद कैसे हो सकता है। पता नहीं कौन सा पुल फर्स्ट आया।

वैसे भी गिरना अचानक नहीं आता। लंबी साधना करनी पड़ती है। गुफा में धूनी रमानी पड़ती है। ये दीगर बात है कि पुल अल्प साधना में ही मोक्ष पा गये।

   कुछेक को गिरकर भी मोक्ष नहीं मिलता। उन्हें लाख कोशिश करने पर भी सलीके से गिरना नहीं आता।

–ऐ जी कितना प्रवचन पिला रहे हो सोमरस वाले बाबा जैसा।

—पिलाएं नहीं तो क्या। रुपया गिरता है तो तुम कहती हो–डाॅलर उठा इसलिए रुपया गिरा। लब्बोलुआब ये कि डाॅलर ने गिराया। कुछ लोग गिरते हैं , कुछ गिराते हैं। सभी हर कला में दक्ष नहीं होते ना। अब तो 64 की जगह 66 कलाओं की बात होनी चाहिए।

–देखिए जी, हर चीज के गिरने का अपना वक्त, अंदाज़ और अदा होती है। पुलों ने मानसूनी मौसम में लहराकर गिरना चुना

**गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में

वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले। । **

–तो तुम गिरने के लिये भी गौरव की व्यवस्था कर रही हो !

–क्यों न करुं। इन दिनों जो जितनी रफ्तार से गिरता है उसका परचम उतना ही ऊँचा लहराता है। पुलों का गिरना अजूबा तो नहीं। आसमान से बिजली गिरती है, बादल से पानी,पेड़ों से पीले पत्ते, पहाड़ों से चट्टानें, पाजेब से घुँघरू गिरते हैं— नदी भी तो समंदर में गिरती है।

–‘तुम तो दार्शनिक होती जा रही हो। बहुत सोचने पर मनुष्य सोचता ही रह जाता है अंततः आध्यात्मिक कहलाने लगता है।

— देखो जी!– तिल का ताड़ न बनाओ। बात जरा सी है। इन दिनों सिर्फ गिरने की चर्चा जंगल की आग की तरह फैलती है, उठने की नहीं। प्रख्यात होने के लिये गिरना जरूरी है। देखते नहीं टी वी चैनलों पर होने वाले पैनल डिस्कशन में उठने उठाने वालों को सद्मा पड़ा हुआ है। वे अपनी ही नज़र में गिरा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि वे भगीरथ प्रयत्न करके भी गिर नहीं पाते, पुलों की तरह। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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