श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २५ ☆
☆ कविता ☆ ~ श्रोता-पाठक ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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मैं श्रोता भी हूँ, मैं ही पाठक हूँ,
मुझे बोलना नहीं आता,
मुझे लिखना भी नहीं आता
पर मुझे ऐसा लगता है कि-
जो मुझे आता है, वह किसी और को नहीं आता,
मेरे विषय में वक्ता और लेखक दोनों,
कुछ कुछ गलतफहमी पाले बैठे हैं,
अपने अहं में ऐठे हैं
मुझे समझ में नहीं आता कि-
ये किसके लिए लिखते हैं,
किसको सुनायेंगे,
कहां से चलकर कहां तक जाएंगे,
श्रोताओं की दुनिया भारी है,
सुनना इन श्रोताओं की लाचारी है,
पुस्तकों को पढ़ना उनकी बीमारी है,
लेकिन ये यदि ऐसा सोचते हैं,
तो बिल्कुल गलत सोचते हैं,
यहां तो बिल्कुल उल्टा है
श्रोता और पाठक दोनों बड़े विद्वान होते हैं,
सुनने और पढ़ने के फन में ये महान होते हैं
मैं तो अक्सर देखता हूं कि
वक्ता स्टेज पर है और श्रोता नदारत है
आप खुद ही बताइए यह किसकी शरारत है
इसका स्पष्ट सा उत्तर है कि
पाठक और श्रोता का एक अलग ही कुनबा है,
ये दोनों अपने फन के निपुण है,
ये दोनों खूब काटते छाटते हैं
यदि श्रोता सुन नहीं रहा है
और पाठक पढ़ नहीं रहा है
तो समझो आपका माल रद्दी है
श्रोता और पाठक दोनों पारखी हैं,
इनका अपना अलग स्टेज सिंहासन और गद्दी है
एक दूसरा नमूना देखिए,
पुस्तक मेले में किताबों के हजारों प्रकार है
इन प्रकारों की संख्या से काफी छोटी
पाठको की कतार है,
अब आप ही समझ लो कि कौन लाचार है
आज की विडंबना कुछ ऐसी है,
अब तो कुछ और होता है-
लेखक आरत दृष्टि से पाठक खोजता है
वक्ता श्रोता के आभाव में,
खुद का भाषण, खुद सुनता है।
अगल-बगल झांक कर श्रोता खोजता है
श्रोता खोजता है ।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



