श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३५ ☆

☆ आलेख ☆ ~ “संकल्प” (एक शब्द विशेष) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

जानने का प्रयास करते हैं। इस सम्बन्ध में मैं एक शब्द विशेष आप सभी के सम्मुख रखने का प्रयास कर रहा हूँ।

वह शब्द विशेष जिसके विषय में मैंने न सिर्फ मनन – चिंतन किया है, बल्कि अध्ययन भी किया है।

शब्द जो स्वयं में सामर्थ्य रखता हो और ऐसा सामर्थ्य जो किसी व्यक्ति को या व्यक्तियों के समूह को निर्धारित लक्ष्य के पार ले जाता हो। आज मैं एक ऐसे शब्द की बात करने जा रहा हूँ-

वह शब्द विशेष है –

☆ “संकल्प” ☆

यदि किसी एकल शब्द को साहित्यिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक भाव से देखे तो –

इस अति महत्वपूर्ण शब्द “संकल्प” का कोई विकल्प है ही नहीं। संकल्प का आश्रय लेकर और संकल्प के साथ कार्य को प्रतिपादित करने वाले महामना जन का मानना है, कि संकल्प शब्द, शब्द के प्रभाव की ऐसी पराकाष्ठा है, जो विश्वास को आधार बनाकर स्व्यं को उस पर स्थापित कर, किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त कराने सहायक होती है।

संकल्प के साथ कार्य करने में दुश्वारी यह है कि लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निद्रा का त्याग करना होगा, स्वयं को अहं दूर रखना होगा, विश्वास को साथ लेकर चलना होगा।

संकल्प को सिद्धि तक ले जाने हेतु सत्य का आश्रय लेना आवश्यक एवं श्रेयस्कर होता है।दुनिया की कोई भी बड़ी से बड़ी समस्या ही क्यों न हो। संकल्प उसे पूर्ण समाधान की ओर ले जाता है। यदि इस शब्द को विभिन्न संदर्भों में ले तो इसका प्रभाव क्या होगा, इसके एक दो उदाहरण आपके सामने रखता हूं।

प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठानो में संकल्प का बड़ा ही महत्व है।

निश्चित संकल्प के साथ मन्त्रोंचार के माध्यम से किया गया अनुष्ठान सिद्धि को प्राप्त करता है।

क्षय मुक्ति आंदोलन पर आधारित मेरा ऐतिहासिक उपन्यास ‘तुमसे क्या छुपाना’ के आवरण पृष्ठ पर लिखा मेरा मूल वाक्य –

“क्षय मुक्त भारत की संकल्पना पर आधारित उपन्यास”

का परिणाम यह कि इस उपन्यास में परम ऊंचाई को प्राप्त किया।

क्षय मुक्ति पर लिखी हुई मेरी पहली कविता जो एन. टी. आई. बेंगलुरु में पढ़ी गई थी, वह यह थी कि –

संकल्प सिद्धि का ले मन में आगे हर कदम बढाना है।

एक सफल उद्घोषक के रूप में पहचान दिलाने में सहायक हुई।

यदि हम संकल्प के आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो मां सती ने जब भेष बदलकर भगवान श्री राम के होने की परीक्षा ली तो उन्हें शिव के क्रोध का भाजन बनना पड़ा-

गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि-

शिव संकल्प कीन्ह मन माही

एहि तन सती भेंट अब नाहीं

यह संकल्प को शिव संकल्प नाम दिया गया। 

वहीं यदि मैं अपने जनपद बलिया की बात करूं,तो मेरे जनपद में कला एवं संस्कृति से जुडी हुई एक संस्था है जो साहित्य संस्कृति और कला को प्रोत्साहित करती है और जिसके संस्थापक अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी श्री आशीष त्रिवेदी हैं – उस संस्था का नाम है – “संकल्प”

मैं इस संस्था के अनवरत प्रदर्शन को देखकर कह सकता हूँ कि यह संस्था अपने नाम के अनुरूप प्रभाव के साथ स्वयं के संकल्प पर खरी ही नहीं उतरी बल्कि ने संस्था ने अपने निरंतर प्रयास एवं अभ्यास से शिखर को स्पर्श किया है। आज यह संस्था अपना बीसवा अपना स्थापना वर्ष मना रही है।

इस प्रकार कह सकते हैं कि “संकल्प” एक विशेष प्रभावपूर्ण शब्द है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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