श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४३ ☆

☆ आलेख ☆ ~ राष्ट्रकवि स्व जयशंकर प्रसाद जी के जन्मदिवस पर विशेष ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

स्मृतिशेष जयशंकर प्रसाद – (30 जनवरी 1889 – 15 जनवरी 1937)

हिंदी साहित्य जगत के श्रेष्ठ साहित्यकार, महाकवि जयशंकर प्रसाद की बेशकीमती रचना… नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में पीयूष-स्रोत-सी बहा करो · देवों की विजय, दानवों की हारों का… जब आधुनिक युग के श्रेष्ठ गीतकार आदरणीय कुमार विश्वास जी स्वर के माध्यम से, जन मानस के हृदय पट पर तैरती है तो यह यह बताने के लिए सक्षम होती है, इस रचना की गुरुता, गंभीरता और गहराई, कितनी हैl

महाकवि जयशंकर प्रसाद शब्दों के चिंतन, मनन और स्पंदन के अद्वितीय संवाहक हैl विचारों के महासमुद्र से एक से एक भाव मणियों को चुनकर उससे एक महाकाव्य महामाला का सृजन करने वाले इस महाकवि का महाकाव्य ग्रंथ “कामायनी” अनंत ब्रह्मांड से लेकर समुद्र की गहराई तक यात्रा करने में सक्षम हैl

विचारों एवं आध्यात्म की नगरी काशी में जन्मे इस साहित्यकार के शब्दों के महाप्रवाह को उनके गीतों के माध्यम से गुना और देखा जा सकता हैl

बाबा भोलेनाथ की काशी जहां के निकले हुए प्रत्येक स्वर हर बार, हर युग में बड़े साहित्य का सृजन करने की सामर्थ्य रखते रहे हैं..

चाहे वह कबीर, तुलसी, रविदास, मुंशी प्रेमचंद या जयशंकर प्रसाद होl

मानव स्वर ही क्या अलग वाद्य यंत्रों से निकले हुए स्वर भी बहुत दूर तक सुनाई देते हैंl चाहे वह बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से निकला हुआ स्वर हो या बिरजू महाराज के घुंघरू से निकली हुई घूँघनाहट के स्वर होंl

काशी के गोवर्धन सराय की गलियों से गुजरते हुए, आम लोगों से पूछते हुए मैं आगे बढ़ता हूं तो लोग कहते हैं कि बाबू! सुघनी साव के हाता जइबा का..? मैं कहता हूँ हांl तो मेरे बचपन की वह दिन याद आते हैं कि जब मैं पुस्तकों में पढ़ता था, तो प्रसाद जी को एक प्रतिष्ठित सुघनी साव परिवार में जन्म लेने की बात लिखी हैl तंबाकू के व्यवसाय से जुड़े रहने के कारण, इस परिवार नाम की पहचान हुई, ऐसा भी मैंने पढ़ा और जब मैं पावन प्रसाद मंदिर पहुंचता हूँ तो, मेरे मानस पटल पर प्रसाद जी की वही पंक्तियां पुनः गुजरते लगती है..

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में पीयूष-स्रोत-सी बहा करो · देवों की विजय, दानवों की हारों की …

सुंदर-सुंदर भाव शब्दों का रेला बिछाते हुए महाकाव्य की रचना करने वाले प्रसाद जी जिनका विशाल रचना संसार है, उनका जन्म इसी घर में हुआ तो वहाँ मै स्वयं को धन्य पाता हूँ और यह मेरी काशी की साहित्य के तीर्थ यात्रा हुईl

प्रसाद जी एक विशाल व्यक्तित्व हैl प्रसाद साहित्य जगत के ऐसे प्रकाश पुंज है जो कि अपनी छवि अपनी छटा को अत्यंत ही कम समय में इतना बड़ा विस्तार देते हैं, कि यह विश्वास ही नहीं होता है कि प्रसाद जी ने अपने इतने छोटे जीवन काल में कैसे इतना बड़ा कार्य कर दियाl

विगत दिनों आदरणीय जयशंकर प्रसाद की प्रपोत्री, कविता कुमारी प्रसाद, जो कि मेरे मंच की सह सचिव भी है ने मेरे युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच उप्र इकाई के पटल पर एक वीडियो शेयर किया थाl

इस वीडियो के माध्यम से मै शीर्ष लेखक साहित्यकार श्याम बिहारी श्यामल द्वारा प्रसाद की जीवन पर लिखी पुस्तक कंथा पर एक युवा साहित्यकारा, बिटिया आदिति तोमर द्वारा प्रस्तुत विमर्श सुन रहा था… पूरे व्याख्यान को सुनने के बाद ऐसा लगा की प्रसाद जी से जीवन से जुड़ी हुई छोटी से छोटी घटनाओं को इस युवा साहित्यकारा ने जिस ढंग से प्रस्तुत किया, लगता था कि एक एक दृश्य हमारे सामने गुजर रहे हैंl

कुछ घटनाओं को सुनकर तो मन ऐसे प्रफुल्लित होता है, जैसे भ्रमर के लिए मकरंद पुष्प मिल गयाl

बिटिया बोलती है..

प्रसाद जी और प्रेमचंद जी रोज बेनियाबाद में टहलते थेl

एक अंश में एक वाकये का वर्णन करते हुए अदिति कहतीं हैं .

गौड़ जी और प्रेमचंद जी और एक साहित्यकार एक जगह बैठे हुए होते हैं, और ठहाका लगता है तो प्रसाद जी उधर से गुजरते हुए कहते हैंl जरूर कोई अच्छी बात हुई होगी इसीलिए हंसा गया है, तो प्रेमचंद जी कहते हैं कि असली हंसी तो आपके बकवास में ही होती हैl

 

ऐसे भाव – स्नेहल रिश्ते होते हैं काशी के साहित्यकारों में..

प्रसाद जी के जीवन के एक पल एक-एक पहलुओं का इस बिटिया ने इतना सुंदर वर्णन किया है, कि केवल इसके इस विमर्श को ही सुन लिया जाए तो हमें प्रसाद के जीवन से जुड़े हुए बहुत से ऐसे ऐसे अनछुए अंश मिल जाएंगे, जिसकी एक साहित्यकार को तलाश होगीl

 वैसे भी हमें यदि साहित्य की गहराइयों तक जाना चाहते है और यदि अपनी साहित्यिक समझ को और ऊंचाइयों तक ले जाना है, तो हमें बड़े साहित्यकारों के साहित्य का साहित्य को न सिर्फ पढ़ना चाहिए, बल्कि उनके जीवन से बहुत कुछ सीखना चाहिएl

जैसा कि मैं इस लेख के शुरुआत में नारी की बात कही है तो प्रसाद जी के परिवार से ही निकली हुई एक बिटिया, ( कविता कुमारी प्रसाद ) प्रसाद जी के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व को जन-जन तक पहुंचाने के लिए, जिस गति से आगे बढ़ रही है, मैं कह सकता हूं कि..

होनहार बिरवान के होत चिकने पात .. वाली कहावत यहां चरितार्थ होती हुई प्रतीत होती है…

मुझे यह भी लगता है कि इस बिटिया के द्वारा किए गए प्रयासों से महाकवि श्री जय शंकर प्रसाद जी के साहित्य को समझने के लिए आगे बहुत सारे अवसर मिलने वाले हैंl

“आज इस अवसर पर मैं महाकवि जयशंकर प्रसाद जी को सादर नमन करता हूं।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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