श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरणास्पद आलेख चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा।) 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६

☆ आलेख ☆ चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

86 वर्ष की उम्र में भी कर रहे रोगियों की सेवा

ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरे बदन वाले आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी डॉ. रविशंकर मिश्रा याने डॉ. आर. एस. मिश्रा के जीवन का लक्ष्य ही पीड़ितों का उपचार कर उन्हें रोगमुक्त जीवन प्रदान करना है। मित एवं मधुर भाषी डॉ. मिश्रा गंभीर और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे परिचतों, अपरिचितों अथवा इलाज कराने आये रोगियों की पूरी बात ध्यान से सुनते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ ऐसा उत्तर देते हैं कि लोग प्रसन्न और तनाव मुक्त हो जाते हैं। रोगी का आधा इलाज तो उनकी विनम्रता और मीठी वाणी ही कर देती है। वे कहते हैं कि चिकित्सक की वाणी और व्यवहार भी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घटाने – बढ़ने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

25 सितम्बर 1941 को देवरी, सागर में जन्में डॉ. मिश्रा 86 वर्ष की उम्र में भी अपने माता – पिता को दिया पीड़ितों की सेवा का वचन निभा रहे हैं। प्रारम्भिक शिक्षा देवरी से पूर्ण करने के उपरांत मिश्रा जी ने एम जी एम मेडिकल कॉलेज इंदौर से एम बी बी एस किया और 14 अप्रैल 1968 को शासकीय चिकित्सक के रूप में छतरपुर से सेवा प्रारंभ की। इसके उपरांत रीवा से उनकी सेवाएं आर्मी को स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के आजादी के युद्ध में सीमा पर भारतीय सेना के घायल जवानों का मनोयोग से उपचार किया। आपने पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर भी लंबे समय तक सैनिकों का उपचार किया तदोपरांत पुनः जबलपुर स्थानांतरित हुए फिर दमोह, जबलपुर कोतवाली डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं पनागर में सेवाएं देते हुए 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

चिकित्सक के रूप में वे जहां – जहां पदस्थ रहे उनके संपर्क में आए लोग आज भी उन्हें स्नेह और श्रद्धा से याद करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवाभावी डॉ. मिश्रा ने घर में आराम करने के बजाए अंतिम सांस तक पीड़ितों की सेवा का संकल्प लिया और जबलपुर स्थित महाकौशल के सुप्रसिद्ध चिकित्सालय नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है।

जब उनसे प्रश्न किया गया कि – “आर्मी में सैनिकों की चिकित्सा के दौरान आपने क्या विशेष अनुभव प्राप्त किया?” तब इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में  डॉ. मिश्रा ने कुछ क्षण शून्य में निहारने के उपरांत कहा – “मुझे युद्धों से घृणा हो गई है, मैंने घायल सैनिकों के अत्यंत मार्मिक दृश्य देखे हैं। किंतु हां, नियमित जीवन शैली और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की प्रेरणा मुझे सेना से ही मिली। संभवतः इसी कारण मैं सेवा के अपने लक्ष्य को जीवन के इस पड़ाव में भी निभा पा रहा हूं।”

उन्होंने नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं जारी रहने के प्रति संचालक डॉ. आनंद तिवारी को साधुवाद दिया।

डॉ. आर. एस. मिश्रा जी अपने 58 वर्षीय चिकित्सा सेवा काल में लगभग 25 लाख राेगियों की चिकित्सा का कीर्तिमान रच चुके हैं। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में वे हाकी, बास्केटबाल और कबड्डी के खिलाड़ी रहे हैं। अब फुर्सत में गीत – संगीत सुनना पसंद करते हैं। डॉ. मिश्रा के सुपुत्र आनंद एयर फोर्स में वाइस एयर मार्शल के रूप में देश सेवा – सुरक्षा में रत हैं। डॉ. मिश्रा को स्वस्थ सुदीर्घ जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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