श्री प्रतुल श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “लोकतंत्र खतरे में…!”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३८ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “लोकतंत्र खतरे में…!” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆
“लोकतंत्र खतरे में है।” हमारे देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता – प्रवक्ता और नामवर समाजसेवी जब – तब देशवासियों को इसके प्रति आगाह करते रहते हैं। लोकतंत्र को खतरे में बताने वाले इसके लिए हमेशा ही अपने प्रतियोगी राजनीतिक दलों अथवा अन्य कद्दावर नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं। चाहे भाजपा हो, कांग्रेस, जद, जद (यू) अथवा पश्चिम बंगाल की टीएमसी या दक्षिण भारत के राजनीतिक दल सभी दूसरे दलों और उनके नेताओं की कार्यप्रणालियों को अलोकतांत्रिक बताते हुए लोकतंत्र को खतरा बता रहे हैं। दुनिया को यह बताने के लिए कि भारतवर्ष में अराजकता है, यहां के निवासियों की हालत बहुत खराब है, “भारत में लोकतंत्र खतरे में है” कुछ नेता अक्सर विदेश भी जाते रहते हैं। आश्चर्य है कि हमारे देश में सत्तापक्ष से लेकर सभी विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेताओं सहित गली मोहल्ला तक के नेता देश में लोकतंत्र बचाने की लड़ाई जी जान से लड़ रहे हैं फिर भी लोकतंत्र खतरे में है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकतंत्र के जन्मदाताओं और उसके पालन-पोषण कर्ताओं द्वारा ही स्वहित के चलते नवजात लोकतंत्र की समुचित देखरेख में बरती गई लापरवाही के कारण वह बचपन से ही कुपोषित और कमजोर हो चला हो और इतनी लंबी आयु होने के बाद भी उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं आया। मुझे तो लगता है कि स्वार्थी नेताओं ने जानबूझ कर हमारे देश के लोकतंत्र को मजबूत, बलिष्ठ, हट्टा-कट्टा नहीं होने दिया ताकि अपनी मर्जी पूरी करने कभी भी उसके साथ छेड़छाड़, बलात्कार किया जा सके। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जैसे लोकतंत्र एक अत्यंत “रूपवती कन्या” है और विभिन्न राजनीतिक संगठनों के पदाधिकारी और नेता व उसके टुच्चे आशिक उसे अपने कब्जे में करके उससे अपनी मर्जी का डांस करवाना चाहते हैं। जब मोहल्ला छाप साधारण से त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में मारपीट, खून खराब हो जाता है, बड़े क्षेत्र की शांति व्यवस्था प्रभावित हो जाती है तब यहां तो लोकतंत्र के असंख्य हितैषी – दीवाने और रखवाले हैं। लोकतंत्र को बचाने, उस पर कब्जा करने और उसके पालन-पोषण की इस बहुकोणीय लड़ाई और छीना झपटी में बेचारा लोकतंत्र अब घायल होकर वेंटिलेटर पर पहुंच गया है। निःसंदेह जो वेंटिलेटर पर पहुंच जाता है, उसे मृत नहीं माना जाता अतः कहा जा सकता है कि बीमार ही सही, किंतु अभी हमारे देश में लोकतंत्र जिंदा है। देश के सभी राजनीतिक दल, नेता, अफसर, कर्मचारी, समाजसेवी और सभी धर्मों के संरक्षक अपने-अपने ढंग से लोकतंत्र को बचाने के प्रयास और प्रार्थना कर रहे हैं। उसकी जीवन रक्षा की कामना में रत हैं। मुझे विश्वास है कि हमारे देश का लोकतंत्र कभी न कभी वेंटिलेटर से निकलकर पूरी तरह स्वस्थ और मजबूत होकर खड़ा होगा।
© श्री प्रतुल श्रीवास्तव
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