डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ अंत नहीं, एक नई शुरुआत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

सुबह अलमारी खोलते हुए सुमित ने अपनी पुरानी फाइलें एक तरफ रख दीं।

पत्नी ने पूछा, “आज ऑफिस नहीं जाना?”

सुमित मुस्कुराया, “नहीं। आज से ऑफिस मुझे याद करेगा।”

“और तुम ऑफिस को?”

सुमित कुछ पल चुप रहा।

“शायद उससे ज्यादा उन लोगों को… जिनके साथ रोज़ की चाय भी एक आदत बन गई थी।”

टेबल पर रखा पुराना ऑफिस बैग देखते हुए बेटा बोला, “पापा, अब इसे रख क्यों रहे हो?”

“पता नहीं,” सुमित ने बैग उठाकर कहा, “शायद इसलिए कि हाथ अभी इसे छोड़ना नहीं चाहते।”

पत्नी ने धीरे से कहा, “लेकिन अब आपके पास अपने लिए समय है।”

सुमित ने खिड़की से बाहर देखा।

“अपने लिए समय… यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।”

“तो अब सोचिए।”

वह हँसा, “पहले दिन क्या करूँ?”

पत्नी ने चाय का कप आगे बढ़ाते हुए कहा, “जो मन करे।”

सुमित ने कप थामा और कुछ देर चुप बैठा रहा।

फिर बोला, “कल सुबह जल्दी उठूँगा।”

“क्यों?”

“पता नहीं… बस मन है।”

पत्नी मुस्कुराई।

अगली सुबह अलार्म बजने से पहले ही सुमित उठ गया। उसने जूते पहने, दरवाज़ा खोला और कुछ कदम बाहर बढ़ा।

सामने वही सड़क थी…

लेकिन आज पहली बार उसे लगा-

शायद रास्ता वही था, बस मंज़िल बदल गई थी।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted