श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मि.एंड मिसेस कोयल…“।)
अभी अभी # ९९४ ⇒ आलेख – मि. एंड मिसेस कोयल
श्री प्रदीप शर्मा
जो कूकती है, उसे कोयल कहते हैं। बचपन से आज दिन तक मैने केवल दो आवाजें ऐसी सुनी हैं, जिन पर समय, काल और परिस्थिति कोई प्रभाव नहीं पड़ पाया, एक तो स्वयं कोयल और एक कोकिल कंठी, लता मंगेशकर। अक्सर, दिन यही गर्मियों के होते थे, जब अचानक वातावरण में, किसी पेड़ की ऊंची शाखा से, कुहू कुहू की आवाज गूंज जाती थी। हम भी प्रत्युत्तर में उसकी नकल करते हुए कुहू कुहू दोहराते। हम थक जाते, लेकिन वह कभी नहीं थकती। आज भी वही
कोयल है, और वही उसकी चिर परिचित मीठी कूक।
हमने बचपन में एक अंग्रेजी कविता पढ़ी थी, जिसमें कोयल की कूक का जिक्र तो नहीं था, लेकिन एक मुर्गे महाशय का जरूर था।
The cock is crowing
And the birds doth twitter.
समय के साथ भले ही मुर्गे की आवाज दबती चली गई और घर की मुर्गी दाल बराबर हो गई हो, न तो मुर्गे ने बांग देना बंद किया और ने ही मुर्गी ने अंडे देना। कैसे कैसे वॉरियर्स हैं, वॉलंटियर्स हैं प्रकृति में, निष्काम, निःशब्द, निरहंकार।।
कोयल की बात हो, और सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जिक्र ना हो, यह मुमकिन नहीं। जब लताजी ने स्वर्ण सुंदरी का यह खूबसूरत गीत राग यमन में गाया होगा तो कोयल ने भी मुदित मन से ना केवल अपना सिर हिलाया होगा, लता जी के साथ जरूर कुहू कुहू दोहराया होगा। गीत देखिए ;
कुहू कुहू बोले कोयलिया
कुंज कुंज में भंवरे डोले
गुन गुन बोले, अमृत घोले।
इन पक्षियों को राग रागिनी कौन सिखलाता है। जो पक्षी गा सकता है, वह मूक कैसे कहला सकता है।
हम उसकी भाषा नहीं जानते, यह कहना ही ठीक होगा। ऐसा क्या है जिस कारण इन पक्षियों का शोर कलरव कहलाता है और हमारा शोर ध्वनि प्रदूषण। ।
जंगल में मोर नाचा, किसने देखा ! मोर महाशय कभी हमारे लिए नहीं नाचते। वे तो मिसेस मोरनी को प्रभावित करने के लिए अपने मोर पंख फैलाकर गोपीकृष्ण की तरह अपनी छटा बिखेरते हैं। यह एक आम धारणा है कि कोयल भी मादा ही है। बचपन की एक कविता तो यही कहती है ;
कौआ कोयल दोनों काले
पर दोनों के नाम निराले।
कांव कांव कौआ करता है,
कोयल कू कू बहुत सुहाती
डाल डाल पर वह है गाती। ।
अब जो गाती है, वह अगर कोयल हुई, तो कहीं ना कहीं उसके मिस्टर भी तो होंगे ही। जब मामले की तह में जाने की कोशिश की तो विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ कि हम जिसकी आवाज़ पर फिदा हैं, वे तो मिस्टर कोयल निकले। ये मिस्टर कोयल काले जरूर हैं, लेकिन इनकी ही कूक में दम है। यानी यहां भी मोर मोरनी वाला ही मामला दिखता है। हमें मिसेस कोयल से पूरी सहानुभूति है। हम कोई पक्षी विशेषज्ञ नहीं, अधूरा ज्ञान बांटने से अच्छा है, क्यों न किसी जानकार की राय ले ली जाए। हम तो इस विषय में पक्षी विशेषज्ञ सलीम अली को ही अथॉरिटी मानते हैं। इस विषय में क्या कहता है आपका पक्षी ज्ञान, पूछता है भारत।
यह हमारी भी आस्था का सवाल है। क्या नारी विमर्श की तरह पक्षी संगठन में मिसेस कोयल के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठा सकता। जिसकी आवाज मधुर है, जिसकी कुहू कुहू हमें बहुत सुहाती, वह कोयल ही है।
या यहां भी कोई धर्मराज इनकी आवाज को दबा देगा। नरो वा किं मादा वा। निष्कर्ष कुछ भी हो, कोकिल कंठ तो भारत रत्न लता ही हैं और सदैव रहेंगी। ।
स्वर तो स्वर होता है, हमारी भेद बुद्धि ही उसे स्त्री पुरुष के सांचे में ढालती है। नाद ब्रह्म भेद रहित होता है। जब प्रकृति और पुरुष का भी भेद समाप्त हो जाता है, तब ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है। लेकिन हमें इससे क्या।
मूक बेजुबान पशु पक्षियों को पालतू बनाना, उनके साथ अन्याय करना है। कोयल पक्षी भी बहुत समझदार है। दूर के ढोल की तरह वह भी, मनुष्य की पहुंच से ऊपर, वृक्ष की किसी ऊंची डाल पर ही अपना डेरा जमाता है।
इनके बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती है। इनके पास जाएं, इन्हें परखें, अपनाएं, लेकिन इनकी आजादी में बाधा ना पहुंचाए। इतना बड़ा आंचल है इस वसुंधरा का। प्रेम और दया के पात्र इन शांति दूतों की रक्षा और सुरक्षा ही पर्यावरण की सुरक्षा है। कभी आप मिसेस कोयल की आवाज सुनें तो बताएं, यकीनन, मिस्टर कोयल से उन्नीस ही होगी, बीस नहीं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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