श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “व्यंग्य की धार।)

?अभी अभी # 313 ⇒ व्यंग्य की धार? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुझे तरस आता है उनकी बुद्धि पर, जो आलोचना को भी साहित्य की एक विधा मानते हैं। इससे तो हमारी राजनीति अच्छी, जब चाहो, जहां चाहो, मुंह उठाकर किसी की भी आलोचना कर दो। इधर आम शिकायत है कि आज के व्यंग्य में शरद और परसाई जैसी धार कहां, और उधर पत्नी की भी शिकायत है कि न तो घर की कैंची में धार है और न ही सब्जी काटने वाले चाकुओं में।

धार से याद आया, मोहल्ले में एक धार करने वाला व्यक्ति आया करता था, जिसके पास चाकू छुरियों को तेज करने वाला एक साइकिल के पहिए जैसा लोहे का उपकरण था, जिससे रगड़ने पर चिंगारियां निकलती थी और औजारों की धार तेज हो जाती थी। चक्कू छुरियां तेज करा लो, जैसे फिल्मी गाने की प्रेरणा भी वहीं से ली गई है।।

हमारे घरों में हथियार के नाम पर शायद चाकू छुरी और कैंची ही मिले। पत्नी की शिकायत पर मेरी हिम्मत नहीं हुई यह कहने की, कि जबान के रहते आपको कैंची की क्या जरूरत, फिर खयाल आया रसोई में तो बेलन जैसा एक हथियार और है, जिसे धार करवाने की जरूरत ही नहीं पड़ती और जिसका प्रयोग कभी भी अस्त्र के रूप में, पत्नी द्वारा किया जा सकता है।

पहले छुरी कैंची लोहे की आती थी, जिनका स्थान अब स्टील ने ले लिया है। कैसी उल्टी गंगा बह रही है आजकल, लोगों की जबान तो कैंची की तरह चल रही है, लेकिन कैंची जबान की तरह नहीं चल रही। घर गृहस्थी और बच्चों के घर में अगर चाकू छुरी में धार कम हो तो एक तरह से ठीक ही है। उंगली वगैरह कटने का अंदेशा कम ही होता है।।

व्यंग्य को धारदार बनाने में राजनीति का बहुत योगदान रहा है। वैसे भी विसंगति और राजनीति में कोई विशेष फर्क नहीं। राजनीति ने कभी व्यंग्य को

गंभीरता से नहीं लिया लेकिन व्यंग्य ने राजनीति को काफी गंभीरता से लिया है। मन्नू भंडारी का महाभोज हो अथवा श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी। परसाई और शरद द्वारा भी राजनीति को नहीं बख्शा गया।

लेकिन जब से राजनीति ने व्यंग्य को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है, व्यंग्य की धार भी भोथरी हो चली है। अब राजनीति पर सीधे वार करने का जमाना गया। आखिर व्यंग्य को छपना भी होना होता है और पुरस्कृत भी होना पड़ता है। गन्ने को वैसे भी जड़ से कौन उखाड़ता है।।

आज व्यंग्य पर राजनीति हावी है। जो धार आज राजनीति में है, वह व्यंग्य में नहीं। आज का व्यंग्य धार नहीं देखता, तेल देखता है, तेल की धार देखता है। व्यंग्य की धार इतनी पैनी भी ना हो, जो खुद अपना ही हाथ कटा बैठे।

सबकी अपनी अपनी घर गृहस्थी है। धार उतनी ही हो, जो किसी पर वार ना कर सके। काश व्यंग्य की धार पैनी करने का भी कोई दादी मां का घरेलू नुस्खा होता। राजनीति पर व्यंग्य कसने के दिन अब लद गए।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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