श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लंगर, भंडारा और कार सेवा”।)  

? अभी अभी # 50 ⇒ लंगर, भंडारा और कार सेवा? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं! सेवा नि: स्वार्थ हो तो क्या बात है। अन्नदान नहीं आसान। अगर आप किसी  भूखे को भोजन करवाते हैं, तो बहुत बड़ा काम करते हैं। भंडारा और लंगर वह भोजन होता है जो शुद्धता से बनाया जाता है और इंसान से पहले  अपने आराध्य को वह अर्पित किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में वह सार्वजनिक रूप से परोस दिया जाता है।

तीनों प्रकार की ये सेवाएं आस्था से जुड़ी हैं। समय और परिस्थिति अनुसार इन सेवाओं में    फेरबदल हो सकता है, लेकिन सेवा की भावना ही इन सबमें प्रमुख है। आज अन्नदाता पर राजनीति संभव है लेकिन अन्न सेवा पर नहीं। बड़े बड़े शहरों में  आजकल घर घर राम रोटी जैसी योजनाएं सामाजिक संस्थाएं चला रही हैं, जहां हर घर से अस्पताल के मरीजों और उनके परिजनों के लिए ना केवल भोजन, अपितु दवाइयों और वस्त्रों की भी व्यवस्था की जा रही है। लेकिन वे किसी राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा नहीं, एक स्वयं – स्फूर्त सेवा है। ।

सेवा नि:स्वार्थ की जाती है फिर भी बच्चों की तरह इसमें भी लालच दिया जाता है। करोगे सेवा, तो पाओगे मेवा, और लोगों ने मेवा हासिल करने के लिए समाज सेवा को अपना लिया। राजनीति से बड़ी कोई मानव सेवा नहीं। राजनीति में मेवा ही मेवा है।

सेवा ही धर्म है! आप जो रोज भोजन करते हैं, उसमें न केवल एक रोटी गाय और कुत्ते की निकाली जाती है, संस्कारी परिवारों में पहले भगवान को भोग लगाया जाता है, उसके बाद ही भोजन ग्रहण किया जाता है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में भी पहले अपने आराध्य को भोग लगाया जाता है, बाद में वह भक्तों में प्रसाद स्वरूप बांटा जाता है। कभी इसे भोग, राजभोग अथवा छप्पन भोग भी कहते हैं। हमारे शहर में लॉक डाउन के पूर्व एक भंडारे में दस लाख लोगों ने सड़क पर बैठकर हनुमान जी की प्रसादी ली थी। छोटे छोटे व्यापारी और ऑटो रिक्शा चालक तक मिल जुलकर सांई बाबा के भंडारे का आयोजन करते हैं। अन्नपूर्णा के भंडारे में कभी कोई कमी नहीं होती। लोग मुक्त हस्त से दान दे, पुण्य अर्जित करते हैं। ।

कार सेवा के बारे में हर कार मालिक और चालक जानता है कि नियत समय पर कार की भी सर्विसिंग करवानी पड़ती है। आडवाणी जी ने एक रथयात्रा निकालकर यह संदेश हर राम भक्त तक पहुंचाया कि ईश्वर की सेवा ही सच्ची कार सेवा है। वही आपकी ज़िंदगी की गाड़ी चला रहा है। तब से ही हर राम भक्त एक कार सेवक कहलाने लगा। उसी कार सेवा के फलस्वरूप आज अयोध्या में राम मंदिर बनने जा रहा है। धर्म की रक्षा के लिए सभी आंदोलन जायज हैं।

गुरुद्वारों में रात दिन चौबीसों घंटे कार सेवा चलती रहती है। धर्म से बड़ा कोई शासन नहीं होता। धर्म शासनत:।। लंगर, भंडारे और महाप्रसाद में कोई अंतर नहीं होता। हम अपने इष्ट की सेवा में सर्वस्व अर्पित करने की भावना रखते हैं। उसी भावना से प्रेरित है गुरुद्वारे का लंगर। अमीर गरीब, साधु शैतान और दोस्त दुश्मन जैसा भेद लंगर अथवा भंडारे में कभी नहीं किया जाता। पांच सितारा भोजन भी लंगर के आगे फीका होता है। भक्ति और भाव की जहां गंगा बहती है, वहीं लंगर होता है, भंडारा होता है, ठाकुर जी को भोग लगता है, प्रसादी मिलती है।

पावन उद्देश्य से की गई सभी सेवा, सभी आंदोलन, भोजन, भंडारे, लंगर, एवं कार सेवा समाज के कल्याण के लिए होती हैं, बस इनका उद्देश्य अगर राजनीतिक ना होकर पारमार्थिक हो। देखो ऐ दीवानों तुम ये काम ना करो, कार सेवा, भंडारे और लंगर जैसे पवित्र सत्कार्यों को बदनाम ना करो। बोले सो निहाल। जय श्री महाकाल …!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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