श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बात अभी अधूरी है।)

?अभी अभी # 567 ⇒ बात अभी अधूरी है ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बीमारियां कई तरह की होती हैं, कुछ का इलाज किया जा सकता है, कुछ लाइलाज होती हैं। हम यहां वात रोग की नहीं, बात रोग की ही बात कर रहे हैं, जो बिना बात के शुरू होता है, और सारी बातें हो जाने के बाद भी, बात अधूरी ही रह जाती है।

बाल मनोविज्ञान यह कहता है कि बोलने की कला बच्चा, सुन सुनकर ही सीखता है। बच्चों से बात करने में बड़ा मजा आता है, खास कर, जब वे चार छः महीने के हों। उनकी आंखें एक जगह टिकनी शुरू हो जाती हैं, और वे हर आवाज को बड़े गौर से सुनते हैं।

एक झुनझुने की आवाज से वे रोना भूल जाते हैं, लोरी सुनाओ तो सो जाते हैं, और मचलते बालक को गाय अथवा तू तू किंवा माऊ, यानी बिल्ली दिखाओ तो बहल जाते हैं।।

उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज होती है। एक एक शब्द को वे ध्यान से सुनते ही नहीं, हमारे हाव भाव को भी नोटिस करते हैं। हमारी अनावश्यक लाड़ भरी बातें सुनकर भी वे आनंदित होते हैं, किलकारी मारते हैं। लेकिन हम नहीं जानते, वे हमारे बिना बताए ही कितना सीख जाते हैं।

फिर शुरू होता है उनके बोलने का अध्याय। लड़कों को अपेक्षा लड़कियां अधिक जल्दी बोलना और चलना सीख लेती हैं, क्योंकि उन्हें जीवन में शायद अधिक बोलना चालना पड़ता है। अपनी सीमित वाक् क्षमता में छोटे छोटे वाक्य बनाना उनकी खूबी होता है। वे वही बोलते हैं जो वे सीखते हैं, बस उनका बोलने का अंदाज अपना अलग ही होता है।।

बस यहीं से बोलने की जो शुरुआत होती है तो फिर बोलना कभी नहीं थमता। जो बालक अंतर्मुखी होते हैं, वे सोचते अधिक हैं, बोलते कम हैं। और कालांतर में यही उनका स्वभाव बन जाता है।

हर घर में हां, हूं की यह बीमारी आजकल आम है। महिलाओं का स्वर तो स्पष्ट सुनाई दे जाता है़, पुरुष की आवाज सुनने के लिए कानों पर जोर देना पड़ता है। अजी सुनते हो, शब्द कितने पुरुषों के कानों तक पहुंचता है, कोई नहीं जानता। घर में पत्नी को अगर बोलने की बीमारी है तो पति को भूलने की। कितनी बातें याद दिलानी पड़ती हैं, पर्स, रूमाल, चाबी, चश्मा, हद है।।

सुबह सोते बच्चों को उठाना इतना आसान भी नहीं होता। पच्चीस आवाज लगाओ, सबके चाय नाश्ते, टिफिन की तैयारी करो, बोल बोलकर थक जाते हैं, लेकिन किसी के कान में जूं नहीं रेंगती। काम वाली बाई की अलग किचकिच।

दोपहर में थोड़ा आराम मिला तो अड़ोस पड़ोस में मन बहला लिया, फोन पर एक दो घंटे बात कर ली, तो मन हल्का हो जाता है। जो आराम बातों से मिलता है, उसका जवाब नहीं। बातों की कोई कमी नहीं, बस शिकायत यही है कि आजकल कोई बात करने वाला ही नहीं मिलता। अकेले में क्या दीवारों से सर फोड़े। आदमी का टाइम तो यार दोस्तों में कट जाता है, हमारी किटी पार्टी इनको अखरती है।।

यह घर घर की बात है। जिसके पास कुछ बोलने का है, वही बोलेगा। जिसने मुंह में दही जमा रखा है, वह क्या बोलेगा। हमें घर गृहस्थी की, बाल बच्चों की फिक्र है, चिंता है, इसलिए बोलना ही पड़ता है।

गलत बात हम बोलते नहीं, किसी की गलत बात सुनते नहीं। साफ बोलना सुखी रहना। मन में किसी बात को दबाकर रखना परेशानी का कारण बन जाता है। बोलने से इंसान हल्का हो जाता है। समय इतना कम है, बहुत सा काम बाकी है। बाकी बातें, बाद में। असली बात अभी अधूरी है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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