श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फ्रेंड्स लॉज ।)

?अभी अभी # 613 ⇒  फ्रेंड्स लॉज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे देश में ऐसा कौन सा औद्योगिक शहर होगा, जहां यात्रियों के ठहरने के लिए सराय, धर्मशाला, होटल अथवा लॉज नहीं हो। सन् ७० और ८० के दशक में, हमारे मालवा की अहिल्या नगरी यात्रियों के लिए एक आदर्श नगरी थी। हाल ही में प्रवासी निवेशकों ने जब इस महानगर के आतिथ्य के जलवे देखे होंगे तो उनका सर गर्व से ऊंचा हो गया होगा।

इंदौर स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्म स्थान भी है। सिख मोहल्ले के जिस गुरुद्वारे के पास का मेहता क्लॉथ स्टार्स आज धरोहर बन चुका है, बस उसी के आसपास थी कभी हमारी फ्रेंड्स लॉज। जब इंदौर हमारा है तो फ्रेंड्स लॉज भी हमारी ही हुई न। ।

एक यात्री को क्या चाहिए ! ठहरने की उत्तम व्यवस्था और स्वादिष्ट भोजन। आइए धर्मशालाओं से शुरुआत करें। धर्मशाला अगर सस्ती, सुंदर, सुविधायुक्त और बाजार में ही हो तो अति उत्तम। धर्मशाला और प्याऊ से इस शहर का बहुत पुराना नाता रहा है।

नसिया जी की धर्मशाला हो, छावनी की जगन्नाथ जी की धर्मशाला, अथवा शिकारपुर की सिंधी धर्मशाला, इस शहर में आज भी हर समाज की अपनी अपनी धर्मशाला है।

हुकमचंद सेठ की तो छोड़िए, यहां परदेशीपुरा में तो सेठ राखौड़ीमल की भी धर्मशाला है। जेलरोड, जो आजकल नॉवेल्टी मार्केट बन चुका है, वहां आज भी श्रीराम धर्मशाला मौजूद है।

चलिए अगर आपको धर्मशाला में नहीं रुकना तो यहां कई लॉज हैं। आज से ५० वर्ष पुराना इंदौर तब इतना विस्तृत, आधुनिक और भीड़भाड़ भरा नहीं था। आप इंदौर की मुख्य सड़कों पर शाम को भी परिवार सहित टहलने जा सकते थे। आज वहां पार्किंग तक की भी जगह नहीं। ।

तब अधिकांश यात्रियों का  आगमन रेल अथवा बस से ही होता था। सरवटे बस स्टैंड के सामने ही ठहरने के लिए चंद्रलोक लॉज थी। गांधी हॉल के सामने आराम लॉज और रामपुरावाला बिल्डिंग में सेंट्रल होटल थी। थोड़ा आगे चलने पर ही तो थी यह फ्रेंड्स लॉज जहां ठहरने की सुविधा के साथ माहवारी भोजन की भी व्यवस्था थी।

होटल और लॉज का रिश्ता 2 in 1 का रहता है। एक मुसाफिर को दुनिया में क्या चाहिए। बस ठहरने की अच्छी जगह और स्वादिष्ट भोजन चाहिए। बाहर के व्यापारी क्लॉथ मार्केट खरीदी के लिए आते थे। वहीं सीतलामाता बाजार में पृथ्वीलोक लॉज में रुक गए, ऊपर पृथ्वीलोक भोजनालय में शुद्ध सात्विक स्वादिष्ट शाकाहारी खाना भी।।

गुजराती साइंस कॉलेज में तब केन्या और नैरोबी से प्रवासी गुजराती छात्र पढ़ने इंदौर आते थे। यहां उनका एडमिशन आसानी से हो जाता था। फ्रेंड्स लॉज नजदीक ही था। पूरा इंदौर साइकिल पर आसानी से नाप लिया जाता था।

फ्रेंड्स लॉज की ही तरह शहर के अन्य प्रमुख हिस्सों में भी कई लॉज और होटलें थीं, लेकिन तब वातावरण सभी जगह उतना ही फ्रेंडली था जितना दोस्तों के बीच होना चाहिए। आज भले ही फ्रेंड्स लॉज वहां नहीं हो, लेकिन उस जमाने के दोस्तों की यादें तो आज भी मौजूद हैं। ।

तब कहां फोन और कहां मोबाइल, न दिन देखा न रात, उठाई साइकिल और चल पड़े दोस्त के पास।

सुविधाएं नजदीक आती चली गई, दोस्त दूर होते चले गए।

आजकल कौन ठहरता है धर्मशाला और लॉज में।

इतनी पांच सितारा होटलें किसके लिए खुली हैं।

अपने ही शहर को देखने के लिए आज एक टूरिस्ट की निगाह चाहिए। कुछ नहीं बचा पुराना। बस एक आम इंसान, बचा खुचा, पुराना। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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