श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पाप का घड़ा ।)

?अभी अभी # 617 ⇒ पाप का घड़ा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पुण्य का कोई घड़ा नहीं होता। आप पुण्य संचित करते जाइए, उसका हिसाब चित्रगुप्त रखेंगे और स्वर्गवासी होने के बाद आपको स्वर्ग में प्रवेश देंगे। लेकिन पाप का ऐसा नहीं है, आप पाप करते जाइए, आपके पाप का घड़ा भरते जाएगा। यह घड़ा आपको कौन देता है, पता नहीं, लेकिन जो दुष्ट और पापी होते हैं, उनका ही पाप का घड़ा भरता है।

पाप की एक गठरी भी होती है जो पिछले कई जन्मों की होती है और हर जीव उसे अपने सर पर उठाए घूमा करता है, इस जन्म से उस जन्म तलक।

किसी ने कहा भी तो है ;

ले लो ले लो दुआएं

मां बाप की।

सर से उतरेगी

गठरी पाप की।।

पाप की तरह पुण्य भी एक जन्म से दूसरे जन्म तक ट्रांसफर होते रहते हैं। बड़े विचित्र हैं मिस्टर चित्रगुप्त। हम सब पिछले जन्मों के पाप और पुण्य को ही तो भोगते रहते हैं। इस जन्म के पाप पुण्य और उसमें शामिल होते रहते हैं। कभी देखी है किसी ने अपने पिछले कर्मों के पाप और पुण्य की बैलेंस शीट।।

लेकिन ईश्वर कितना दयालु है। गीता में भगवान कृष्ण शरणागत अर्जुन के समक्ष ऐलान कर देते हैं ;

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

18.66।

सभी जानते हैं, इसके अनुवाद की आवश्यकता नहीं, लेकिन समझने की अवश्य जरूरत है। तू अगर सभी धर्मों को त्याग शरणागत हो अगर कोई पाप करता भी है, तो मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा। वैसे भी पाप और पुण्य दोनों ही मोक्ष के मार्ग अवरोधक हैं।

हम अगर यदा कदा दान दक्षिणा, यज्ञ हवन और तीर्थाटन करते रहे, गंगा स्नान कर पाप धोते रहे, तो हमारा पाप का घड़ा तो भरने से रहा। फिर हम प्रार्थना, प्रायश्चित, जप तप और पूजा पाठ भी तो करते रहते हैं। अगर जमा खर्च की तरह देखें, तो पाप की बनिस्बत पुण्य ही अधिक जमा होगा हमारे खाते में।।

कुंभ स्नान और गौ सेवा के साथ साथ साधु संतों का संग और कथाओं का श्रवण हमारे रहे सहे पापों को भी नष्ट करने में सक्षम होता है, अर्थात् हमारे खाते में अब सिर्फ पुण्य ही बच रहता है।

अगर यही स्थिति आज हर सनातन हिन्दू की रहती है, तो मान लीजिए, हमें स्वर्ग नहीं जाना पड़ेगा, साक्षात् स्वर्ग ही इस धरा पर अवतरित हो जाएगा।

हो सकता है, हमें ऐरावत हाथी, पारस पत्थर, कल्पवृक्ष और कामधेनु भी उपलब्ध हो। घी दूध की नदियां तो वैसे भी बहेंगी ही, साथ में  मक्खन और पनीर की भी।।

उधर जो उग्रवादी, नास्तिक, विधर्मी, आदि हैं, उनके तो पाप के घड़े भरते ही जाएंगे और जब एक दिन उनके पाप का घड़ा फूटेगा, तो वे नर्क के भागी होंगे। जैसी करनी वैसी भरनी।

जो समझदार होते हैं, उन्हें तो केवल इशारा ही काफी होता है। आगे क्या कहूं, आप खुद समझदार हो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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