श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कल्याण…“।)
अभी अभी # ८६२ ⇒ आलेख – कल्याण
श्री प्रदीप शर्मा
ईश्वर का एकमात्र उद्देश्य इस सृष्टि का कल्याण है। सिरजनहार, पालनहार और संहारक ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही तो हैं। कल्याण
एक सर्वविदित, सार्वभौमिक, सकारात्मक शब्द है, जिसमें सबका हित, मंगल और शुभ-लाभ निहित है। गीता प्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका कल्याण एक समय घर-घर आती थी। बिना किसी विज्ञापन का, कम कीमत, अधिक ज्ञानवर्धक, धार्मिक सामग्री अपने आप में समेटे हुए। परिवार के लोग बड़ी आस्था और श्रद्धा से इसे उलट-पुलटकर देख लेते थे। यही वह समय था जब सरिता-मुक्ता के साथ बच्चों का चंदामामा घर में प्रवेश पा जाता था।
जब सामंती युग था, तब राजा का जन्म प्रजा के कल्याण के लिए होता था। समय के साथ राजा बदलते गए, सामंती युग का स्थान लोकतंत्र ने ले लिया। आज भी सरकार का प्रथम एवं एकमात्र कर्तव्य आम आदमी का कल्याण है। अंग्रेज़ लोग इसे वेलफेयर ऑफ स्टेट कहते थे।।
पहले मुझे हर शब्द के डिक्शनरी मीनिंग जानने की आदत थी ! आजकल मैं भी गूगल सर्च कर लिया करता हूँ। मन हुआ, kalyaan को गूगल सर्च करूँ ! गूगल सर्च मुझे कल्याण मटके की ओर ले गया। कल्याण का यह अर्थ मेरे लिए नया था। सिर्फ रतन खत्री का मैंने नाम भर सुन रखा था। अंग्रेज़ी में भी कल्याण का एकमात्र अर्थ welfare निकला।
मैंने हिंदी दिवस के उपलक्ष में कल्याण को हिंदी में सर्च किया, तब जाकर उसका अर्थ कल्याण पत्रिका निकला। कल्याण पत्रिका ने कितनों का कल्याण किया, इस पर गूगल सर्च मौन है, लेकिन शायद इस पर, कहीं ना कहीं, कोई ना कोई, रिसर्च अवश्य चल रही होगी।।
पंडितों, महात्माओं और बुजुर्गों का तकिया कलाम है यह शब्द कल्याण ! समाज में देखो तो हर कोई एक दूसरे का कल्याण करने में लगा है। नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर कितने वर्षों से अपाहिजों का कल्याण करता चला आ रहा है। कलयुग में केवल एक ही कैलाश ने मानव के रूप में जन्म लिया है, और उनका नाम है अपाहिजों के मसीहा, 1008 संतश्री कैलाश मानव। लेकिन अपाहिज, जो अब दिव्यांग हो गए हैं, कम होने का नाम ही नहीं ले रहे।
एक ओर विदिशा के हमारे कैलाश सत्यार्थी जिन्हें जब तक बाल मजदूरी के लिए, उनके द्वारा किये गए उनके अनथक प्रयासों पर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल गया, उन्हें कोई प्रसिद्धि नहीं मिली, और दूसरी ओर अपनी अच्छाई का और समाज कल्याण का सोशल मीडिया पर प्रचार करते व्यक्ति और संस्थाएं, कभी भ्रमित कर देती हैं, तो कभी आश्चर्यचकित, कि इतने लोगों के प्रयत्नों के बावजूद ऐसा क्या है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है। इतना कल्याण, फिर भी यही शिकायत, लो हो गया कल्याण।।
इतने संत, बाबा, समाज सुधारक, एनजीओ, मंदिर, मस्ज़िद, चर्च, गुरुद्वारे किसके लिए ! मानव मात्र की भलाई के लिए। पिछले 70 वर्षों का इतिहास हम टटोलें, उसके पहले ही हमारा ध्यान एक ऐसे शख्स पर चला जाता है, जिसे देश की जनता ने पाँच वर्ष की अवधि के लिए, अपने हित और कल्याण के लिए एक आम- मुख्तयारनामा लिखकर दिया है। और वह इंसान अकेला 135 करोड़ के कल्याण के लिए जी जान एक कर रहा है। आज उसका एक पाँव यहाँ है तो कल चीन में। उसकी आँखों के आँसू थम नहीं रहे, आँखों से नींद गायब है। बस एक झोला लेकर आया है यह मसीहा, हम सबके कल्याण के लिए।
यह देश सदा से धर्म, नैतिकता और सदाचार को सर आंखों पर बिठाता रहा है। जन जन में धर्म के प्रति आस्था का सम्मान करते हुए पहले गीता प्रेस गोरखपुर जैसे संस्थान को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा और फिर राम की भद्रता का ध्यान धरते हुए प्रज्ञाचक्षु रामभद्राचार्य के चरणों में भी ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्पित कर दिया।।
हम अपना कल्याण खुद क्यों नहीं कर पाते ! क्यों हमें बाबा, महात्मा, राजनेता और स्वयंभू मसीहाओं की आवश्यकता पड़ती है, इसका उत्तर जब हमें मिल जाएगा, विश्व का ही या न हो, हमारा कल्याण अवश्य हो जाएगा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




