श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रै दा स।)

?अभी अभी # ८७१ ⇒ आलेख – रै दा स ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दासत्व अथवा दास प्रथा अगर अभिशाप है,मानवता पर कलंक है तो दासबोध अथवा दास्य भाव भक्ति भाव की सर्वोच्च अवस्था है जहां केवल सूरदास,तुलसीदास और रैदास जैसे भक्त शिरोमणि ही पहुंच पाते हैं। आज के युग में भी मोहनदास जैसे व्यक्ति पैदा हुए हैं जिनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।

हम जिस रैदास की बात करने जा रहे हैं,वह एक सीधा सादा,विनम्र लेकिन मेहनती मोची था,जो सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक कोर्ट कंपाउंड के बाहर,महात्मा गांधी मार्ग पर,गुमटियों की आड़ में जूते चप्पलों की मरम्मत और पॉलिश से अपनी जीविका चलाता था।।  

आज का महानगर इंदौर,कभी गुमटियों का शहर था। गुमटी एक चलित व्यावसायिक प्रतिष्ठान था,जिसमें पहले पहिए लगे रहते थे। ठेलों और गुमटियों से पहले अतिक्रमण किया जाता था, बाद में इन्हें हटाकर और कहीं बसाया जाता था। महात्मा गांधी मार्ग स्थित गुरुद्वारे के आगे एक समय में केवल लोअर कोर्ट और गांधी हॉल था जिसे पहले टॉउन हॉल कहा जाता था। आज का शास्त्री ब्रिज तब अस्तित्व में नहीं था।

कोर्ट कंपाउंड के बाहर तब नगर निगम ने स्थायी गुमटियों का निर्माण कर दुकानदारों को किराए पर देना शुरू किया जिनमें चश्मा पेन,गोली बिस्किट की दुकानें,टेलरिंग व्यवसायी,  कागज के हार फूल और कपड़ों के व्यापारी शामिल थे। रैदास सुबह सवेरे आता,दुकानदारों के चप्पल जूते मांगकर ले जाता,और पॉलिश करने के बाद वापस कर जाता।

उसके चेहरे के दीन भाव को देख भक्त रैदास का स्मरण हो आता। उसके चेहरे से हमेशा विनम्रता टपकती रहती थी। वह बहुत कम बोलता था और संकोची स्वभाव का था। वह किसी दुकानदार से अपना मेहनताना नहीं मांगता था। अगर पूछो तो हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता था,मानो कह रहा हो, जो आपकी मर्जी !

उसके इसी व्यवहार के कारण कई ग्राहक और आगंतुक भी समय का सदुपयोग करते हुए रैदास से अपना बूट पॉलिश करवा लिया करते थे। दो पैसे और एक आने की पॉलिश के सहारे वह अपने परिवार का पेट पालता था। हां, जूते चप्पल की मरम्मत से कुछ उसकी किस्मत की मरम्मत भी ज़रूर हो जाती होगी लेकिन उसके चेहरे पर संतुष्टि का भाव उसका नूर था,जो उसे आम इंसान से अलग बनाए रखता था।

जन्म और कर्म से कोई पेशा अथवा इंसान बड़ा अथवा छोटा नहीं होता। हम जब छोटे होते हैं,तो इन छोटी छोटी घटनाओं पर गौर नहीं कर पाते और जब तक हम बड़े होते हैं,ये किरदार हमारी ज़िंदगी से बाहर हो जाते हैं। लोभ,लालच और स्वार्थ की इस दुनिया ने गरीब को लालची और बेईमान बना दिया है। शान शौकत और दिखावे की इस दुनिया में कल के रैदास के लिए कोई जगह नहीं है।।  

कुछ दिन पहले मेरे पुराने जूते में कुछ समस्या हुई तो फुटपाथ पर बैठे आज के रैदास पर अचानक नजर पड़ी। वह मोटरसाइकिल से उतरा ही था जीन्स और कैप में मुझसे अच्छा सजा धजा, अप टू डेट। जब उसने अपना स्थान ग्रहण कर लिया तब ही विश्वास हो पाया कि ये सज्जन आज के रैदास अर्थात जूता सुधारक हैं।

उन्होंने बड़े अदब से बात की ! पहले हमें देखा,फिर हमारे जूते को। और आत्म विश्वास से कह दिया, जूता तो खैर गया हुआ है,लेकिन मैं इसे फिलहाल पहनने लायक बना देता हूं। केवल पचास रुपए के पारिश्रमिक में,पंद्रह मिनिट की मोहलत में,हमारी पादुका का कायाकल्प आखिर हो ही गया। बीच बीच में आज के रैदास के फोन की घंटियां भी बजती रहीं,ज़रूरी बातें भी होती रहीं। मैं सोचता रहा,कहां कल का भक्त रैदास, और कहां आज का एडिडास (Adidas)।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments