श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका कथा – “|| राम कथा || ।)

?अभी अभी # 719 ⇒ || राम कथा || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कथा और कहानी में अंतर होता है। किसी के मुख से कही जाए, वह कथा और जो स्वयं अपनी ही व्यथा का बयान करे, वह रामकहानी। यहां कथा से आशय “वह जो कही जाय” अर्थात् ‘बात’। यह मेरे एक मित्र की ऐसी रामकहानी है, जो आज मौजूद नहीं है। इसे महज संयोग ही कहेंगे कि मेरे इस मित्र का नाम भी राम ही था, और मैं उसकी कहानी आपको सुना रहा हूं, इसलिए इसे राम कथा कहा गया है।

मेरा यह राम अयोध्या का नहीं, मेरे शहर के कमाठीपुरे का निवासी था। इसके पिता दशरथ नहीं, खियाराम थे। इसके भी दो भाई भरत और लक्ष्मण थे। यह मेरा सहपाठी तो था ही, इसकी एक साइकिल की दुकान भी थी, जिसका नाम राम साइकिल स्टार्स था। स्कूल के बाद का इसका अधिकांश समय साइकिल की दुकान पर ही बीतता था। ।

साइकिल की दुकान पर साइकिल किराए से दी जाती थी और साइकिल सुधारी भी जाती थी। एक रजिस्टर होता था, जिसमें साइकिल किराए से लेने वाले का नाम, पता और साइकिल देने का समय नोट किया जाता था। साइकिल प्रति घंटे के हिसाब से किराए पर दी जाती थी। कुछ लोग सुबह साइकिल ले जाते और शाम को वापस लाते थे।

साइकिल लेडीज, जेंट्स और बच्चों की भी होती थी।

तब शहर आज जितना व्यस्त नहीं थे। कार स्कूटर की बात छोड़िए, तब अधिकांश घरों में तो साइकिल भी नहीं होती थी। छोटे शहर में जरूरी काम हेतु साइकिल किराए से लेना अधिक सस्ता पड़ता था। दस जगह रुके, अपना काम किया और वापस।

मुझे साइकिल कॉलेज जाते समय मिली थी, उसके पहले पैदल ही स्कूल जाना पड़ता था। ।

अपने पिताजी के साये में मेरा मित्र राम, राजा की तरह रहा। बीच बाजार में मालिक की तरह वह शान से साइकिल की दुकान पर बैठता था। अच्छा मिलनसार था मेरा दोस्त।

उसके रहते मुझे कभी साइकिल की कमी महसूस नहीं हुई। स्कूल जाते वक्त वह घर आता, आवाज लगाता, हम साथ साथ स्कूल जाते।

एक आम इंसान की तरह राम का भी विवाह हुआ, उसके भी बाल बच्चे हुए। अचानक पिताजी के अवसान से कॉलेज की पढ़ाई छूटी, और उसे पुश्तैनी साइकिल की दुकान को संभालना पड़ा। दोनों छोटे भाई सिर्फ नाम के ही भरत और लक्ष्मण थे। बहुत जल्द दोनों भाइयों ने साइकिल की दुकान को ऑटो गैरेज में बदल दिया और अपने बड़े भाई को पास के ही एक कोने में साड़ी फॉल बेचने पर बाध्य कर दिया। ।

ईश्वर भी राम पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहा। बहनों की शादी के बाद, तीन तीन कन्या रत्नों के विवाह का बोझ भी उसके ही कन्धों पर आ पड़ा। फिर भी उसने दोस्तों से मिलना जुलना और मुस्कुराना बंद नहीं किया। एकमात्र जीजाजी संकटमोचक की तरह हर आर्थिक परेशानी में काम आते रहे, लेकिन आखिर कब तक।

मैं लंगोटिया ना सही, फिर भी बचपन का दोस्त और सुख दुःख का साथी था, इसलिए हालात से पूरी तरह वाकिफ था और वक्तन फ़वक्तन छोटी मोटी जरूरतें भी पूरी करता रहता था। लेकिन मुसीबतों का पहाड़ था, जो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ।

मरता क्या न करता, यार दोस्तों, रिश्तेदारों, बाजार और बैंक सभी का वह कर्जदार होता चला गया, जिससे उसकी साख भी घट गई और छोटा मोटा जो धंधा था, वह भी चौपट हो गया। लेकिन फिर भी राम ने हार नहीं मानी और घरेलू सफाई के उत्पाद, एसिड फ़िनाइल इत्यादि घर घर जाकर सप्लाय करने लगा।

इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी मैने उसे कभी विचलित नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक कांतिहीन शांति थी। हो सकता हो, अंदर से वह जड़वत हो गया हो। मैने कई बार उसे कुरेदने की कोशिश की, लेकिन मैं हार गया। कई बार मैने खुद को उसकी जगह रखने की कोशिश की, तो अपने आपको इतना कायर पाया कि सिर्फ आत्महत्या का ही खयाल आया। ।

उसकी हालत बिगड़ती गई, लेकिन मेरी नजरों में वह महान होता चला गया। पारिवारिक परेशानी, आर्थिक तंगी और बदनामी से बेअसर, क्या जिजीविषा इतनी प्रबल होती है कि आत्म सम्मान और स्वाभिमान के अभाव में भी इंसान परिस्थितियों से जूझता रह सकता है।

फिर आखिरकार वही हुआ, जो होना था, मेरा प्रिय दोस्त राम चुपचाप चल बसा। अपने पीछे वह सिर्फ यादें ही छोड़ गया है। हमारी दोस्ती की सुनहरी यादें। मेरे लिए मेरे दोस्त की रामकहानी, किसी राम कथा से कम नहीं। राम का स्मरण ही मेरा नाम स्मरण है। आंसू तो उसके भी सूख चुके थे, हां लेकिन मेरी आँखें नम जरूर हैं।

कथा को तो समाप्त होना ही है। हे राम !

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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