श्री सन्दीप तोमर

(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री संदीप तोमर जी का स्वागत। आपके 4 कविता संग्रह , 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह , एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित। प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में बतौर सह-संपादक/अतिथि संपादक सहयोग। प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में सतत रचनाओं का प्रकाशन। दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका इत्यादि समाचार-पत्रों में रचनाएँ प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा, आलोचना, व साहित्यिक-सामाजिक आलेख प्रकाशित। तेलुगु, उड़िया, कन्नड़, नेपाली, इत्यादि भाषाओँ में रचनाएँ अनुदित। रामदरश मिश्र, ममता कालिया, दीप्ति गुप्ता सहित विभिन्न साहित्यिक हस्तियों के साक्षात्कार प्रकाशित।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा – फूस का मकबरा)

☆ कथा – कहानी ☆ फूस का मकबरा… श्री सन्दीप तोमर

उसकी स्मृति में यह बात अंदर तक समाहित है कि लगातार तीन-तीन बार जुड़वा बच्चे जनने और उनके जिंदा न रहने के बाद अपनी माँ की इकलौती जिंदा संतान होने के कारण उसे घरवालों से हक़ से ज्यादा ही स्नेह मिला। जब वह पैदा हुई तब भी जुड़वा बच्चे ही हुए थे, लेकिन दूसरा बच्चा हफ्ते भर में ही चला बसा था। माँ को एक साल की होने तक भी चिंता रहती कि वह भी बचेगी या नहीं। उसके पीछे कोई और भी पैदा हो माँ और पिताजी दोनों ही के प्रयास रहे लेकिन उसके भाग्य में इकलौता रहना जैसे नियति ने लिख दिया था।

पिता कॉलेज में प्रवक्ता थे, माँ भी नौकरी करती थी। आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहद ऊँचे पायदान पर खड़े उसके परिवार के पास उसे देने को तमाम तरह की सुख-सुविधाएं थी। दुनिया भर की खुशियों के बीच माँ उस पर सब कुछ लुटा देना चाहती थी, बहुत प्यार करती। पिता की शख्त-मिज़ाजी के बावजूद उसे उसके हिस्से का प्यार मिलता ही रहा।

स्कूल जाती थी तो माँ के शिक्षिका होने के चलते उसे लड़का-लड़की जैसा फर्क भी नहीं महसूस हुआ। उसके पढ़ने-लिखने में कोई रुकावट नहीं आई। कई बार किताबों के फट जाने पर दोबारा किताबें मिल जाती, जबकि अन्य सहपाठियों के केस में ऐसा नहीं होता था। जिनके पास किताब खरीदने को पैसे नहीं होते, वह उन सहपाठियों को किताब या अन्य सामान दे देती। कई बार यह भी होता कि अपना खाना किसी सहेली को खिला लंच के समय माँ के पास स्टाफ़रूम में जाकर कहती- “माँ! भूख लगी है। खाना दो।” माँ कहती- ‘सुबह जो लंचबॉक्स दिया, उसका क्या हुआ?’ वह बड़ी मासूमियत से कह देती- ‘वो संध्या है न उसके पास खाना नहीं था तो उसने खा लिया।’ उसकी परवरिश इस तरह हो रही थी कि उसकी निगाह में बेटी होना अपराध जैसा न होकर समानता का ही पर्याय था। वह जो कुछ भी करना चाहती उसके सामने सारे रास्ते खुले थे।

जब वह दस साल की हुई, उसको माँ के स्कूल से निकलकर माध्यमिक विद्यालय में जाना पड़ा। अनुकूल परिस्थितियों में भी उससे सेकंड क्लास में हाईस्कूल पास हुई। पिताजी उसे विज्ञान के विषय पढ़ा कर डॉक्टर बनाने के पक्ष में थे लेकिन उसकी ऐसी कोई इच्छा न थी।

इंटर करने के बाद कॉलेज में बीए में दाख़िला ले तो लिया पर अब पिता की तरफ से  शादी का दबाव बढ़ने लगा। उसने अपने पिता से तीन साल की मोहलत माँगी कि उसके बाद जो चाहो कर लेना, अभी मुझे कुछ कर लेने दिया जाय। पिता को भी लगा कि तीन साल में बी.ए. हो जाएगी तब बेटी के हाथ पीले कर देंगे। अंतत: उसकी बात मान ली गई। कॉलेज में सांस्कृतिक गतिविधियों में वह हिस्सा लेने लगी। कविता लेखन के लिए उसे पुरस्कृत भी किया गया लेकिन पिता की इन सबमें कोई रूचि न थी, न ही वे इन खबरों से खुश ही होते।

कॉलेज में एनएसएस थी, उसने फॉर्म भरा और नामाँकन करा लिया। समाजसेवा का उसका यह पहला अवसर था। जिसे उसने अच्छे से उपयोग किया, शिमला में कैम्प के लिए उसका भी सिलेक्शन हो गया लगा। पिता लड़की को अकेले बाहर भेजने के पक्ष में नहीं थे लेकिन माँ ने पिता से हामी भरवा ली।

गेहुंए रंग के आकर्षक दिखने वाले लड़के से इसी कैंप में मुलाकात हुई। पहली नज़र में ही वह आकर्षक लगा। शाम को कैंप फ़ायर के समय उसने एक प्रेम कविता सुनाकर खूब तालियाँ बटोरी थी। उसके हाथ भी तो अनायास ही न चाहते हुए भी तालियों के लिए उठ गये थे। हालाँकि उसकी कविता को भी कम तालियाँ नहीं मिली थी, ये कविता उसने नारी-सशक्तिकरण पर सुनाई थी, उस पल कामकाजी माँ की छवि उसकी नज़रों में थी। शिखर पर पहुँचने के बाद माँ के आत्मविश्वास से वह रोज रूबरू होती, उसके मन में अपनी माँ के प्रति सम्मान बढ़ गयकी साथ ही माँ के जैसा बनने कि इच्छा भी बलवती हुई। कैसे-कैसे कष्ट सहते हुए उसे माँ का समर्थन हासिल हुआ, यहाँ तक पहुँचाने में कब-कब माँ को पिता के कोप का भाजन बनना पड़ा, सब उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूम गया। उसे यह अहसास भी हुआ कि वह इस जीवन में खुद कुछ कर सकती है, अपने सपनो को साकार कर सकती है।

कैंप में उसका प्रदर्शन देखते हुए एनएसएस की तरफ से उसे अन्य अभियानों में शामिल किया जाने लगा। उसका चयन सेक्स वर्कर्स को स्वास्थ्य सेवाएँ देने वाली टीम में बतौर टीम-लीडर हुआ, जल्दी ही यह अभियान स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ बन गया। माँ को लगा कि इस अभियान में कुछ ऐसा है जो महत्वपूर्ण है लेकिन पिता ने जब समाचार-पत्र में पढ़ा तो आग-बबूला हुए लेकिन वह अभियान के लिए उत्साहपूर्वक तैयारियों में जुटी रही।  गेहुएं रंग वाले लड़के से भी इस प्रोजेक्ट के दौरान मुलाकातें होती रही। लड़का प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिखने का माहिर था, अधिकांश फाइल्स के काम वही करता।

सेक्स वर्कर को स्वास्थ्य सेवाएँ दिलाने के लिए उसे सामान्य चिकित्सा केंद्र से लेकर टी.बी. केन्द्रों तक भी जाना पड़ता, वहीँ उसे यौन संचारित रोगों के बारे में जानकारी मिली।  उसने जाना कि सेक्स वर्कर्स में एसटीआई होने का खतरा सामान्य आबादी से ज़्यादा होता है। इनमें एचआईवी, गोनोरिया, क्लैमाइडिया, सिफ़िलिस, और हर्पीज़ जैसे रोग सबसे अधिक पाए गए। सेक्स वर्कर्स को कई तरह के कैंसर होने का खतरा दिखा, जिनमें सर्विक्स कैंसर के केस सबसे ज़्यादा मिले। इतना होता तो भी वह ज्यादा परेशान न होती, यहाँ तो सेक्स वर्कर्स में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी देखा गया, गरीबी, वित्तीय कठिनाइयां, अनैच्छिक सेक्स वर्क, और वित्तीय दलालों पर निर्भरता मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए जोखिम भरे कारक उसे लगे। वह जितनी भी सेक्स वर्कर्स से बात करती वे उसे बताती- एक डर सा लगा रहता है, अगर ग्राहक न आये या अगर ग्राहक को हमारे रोगों का रत्ती भर भी आभास हुआ तो हमारा धंधा चौपट हो जायेगा, हम अब इस स्थिति में हैं कि हमें कोई और काम न मिल सकता, न ही सुहाएगा।

सेक्स वर्कर्स को स्वास्थ्य समस्याओं का निपटान करने में उसे कई तरह की दिक्कतें आती हैं, जैसे-  कलंक और पूर्वाग्रह के कारण, सेक्स वर्कर्स को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचाना उसके लिए मुश्किल होता। उनको एचआईवी परीक्षण और उपचार जैसे स्वास्थ्य उपचार मिलने में दिक्कत होती। जब वह उनको स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चिकित्सा केंद्र लेकर जाती तो उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता या उन्हें सेवाएं देने से ही मना कर दिया जाता, ऐसे में उसके कई बार झगडे भी हुए, कई बार पुलिस-थाने तक की नौबत आई। लेकिन उसने जो भी काम जिम्मे लिया उस पूरा करने का ठान ही लिया। ऐसा भी हुआ जब उसका नाम अचानक प्रोजेक्ट से हटा दिया गया और अंततः वह अभियान से बाहर भी कर दी गई। उसने हार नहीं मानी, उसे जानकारी मिली कि सामाजिक न्याय ढांचे के तहत व्यापक यौन स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए पेशेवरों को तैयार किये जाने हेतु प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं, उसे ऐसे ही एक कोर्स का पता चला जिसे ऑनलाइन माध्यम से कराया जाता है, जिसमें इच्छुक पेशेवरों को व्यापक यौन स्वास्थ्य शिक्षा और प्रशिक्षण में उत्कृष्टता प्रदान की जाती है। इस एडवांस कोर्स के लिए उसने अप्लाई कर दिया, लेकिन उसके पास इसे करने के लिए पंद्रह हजार रुपये फीस न थी, घर पर इतने पैसे होते हुए भी उसकी इन्हें माँगने की हिम्मत न थी, उसके मन में ख्याल आये- क्यों न मैं भी कुछ दिन… अगले ही पल उसने इस घिनौने विचार को झटक दिया, किस्मत से उन दिनों एक साहित्यिक संस्था द्वारा एक कहानी प्रतियोगिता हुई, जिसे उसके प्रोजक्ट के साथी ने जीत लिया, उसे इनाम में बीस हज़ार रुपये मिले जो उसने अपनी दोस्त के हाथ में रख दिए। वह मदद लेना भी नहीं चाहती थी लेकिन हालात ऐसे थे कि और कोई चारा भी उसके पास नहीं था, उसने कहा- “मैं एक बार सेटल हो जाऊं, तुम्हारे सारे पैसे लौटा दूँगी।”

“देखो! न ही मैं कहीं भागा जा रहा हूँ, न ही ये पैसे ही कहीं भागे जा रहे। तुम इत्मिनान से कोर्स करो, वैसे भी ये पार्टटाइम कोर्स है, तो काम के साथ साथ भी कर पाओगी।”

उसने एक स्कूल में पढाना शुरू किया जो सेक्स वर्कर्स के बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करता था। साथ-साथ कोर्स चल रहा था, इस कोर्स के दौरान ही उसे कितनी ही क़ानूनी जानकारियां हासिल हुई, जिनके माध्यम से वह यौन कर्मियों की लडाई खुद के दम पर भी लड़ सकती है। 

कोर्स के दौरान उसका आत्मविश्वास जैसे नयी ऊँचाइयों को छूने लगा। उसे यह स्पष्ट हो गया था कि यौन कर्मियों की समस्याएँ केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कानूनी, सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी बेहद गहरी हैं। अब वह उनके लिए केवल एक ‘टीम-लीडर’ नहीं थी, बल्कि एक आवाज़ बन चुकी थी— एक मुखर और जागरूक प्रतिनिधि।

एक दिन उसके पास एक यौनकर्मी रोते हुए आई। उसका बेटा स्कूल में दाखिला लेना चाहता था, लेकिन स्कूल प्रशासन ने यह कहकर मना कर दिया कि ‘ऐसे’ लोगों के बच्चों के लिए यह जगह नहीं है। उसने उस माँ का हाथ थामते हुए कहा, “अब किसी को यह कहने का हक नहीं कि तुम इंसान नहीं हो।” उसी शाम उसने शिक्षा विभाग में एक पत्र भेजा—कानूनी भाषा में, ठोस तथ्यों के साथ। सप्ताह भर में उस बच्चे को उसी स्कूल में दाखिला मिला और उस यौनकर्मी ने पहली बार उसकी आंखों में आकर कहा, “तू भगवान नहीं, तू हमारी अपनी बिटिया है।”

उसका अभियान अब व्यक्तिगत स्तर से बढ़कर सामूहिक संघर्ष में बदल चुका था। उसके काम को देखते हुए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने उसे फेलोशिप ऑफर की। यह एक साल की ट्रेनिंग थी— स्वीडन में। अब चुनौती थी— वहाँ तक पहुँचने की, वीज़ा, पासपोर्ट, जाने-आने का खर्च, और सबसे ज़रूरी—पिता की अनुमति। माँ अब भी चुपचाप उसका साथ देती, लेकिन इस बार कुछ कहने से पहले ही पिता ने झल्लाकर कहा, “अगर तुम्हें वही करना है, जो घर की इज़्ज़त को नीलाम करे, तो इस घर से चली जाओ।”

उसी रात उसने अपना सामान समेटा, माँ के पैर छुए और कहा— “माँ, एक दिन बताऊंगी कि ये इज़्ज़त क्या होती है। अभी के लिए मुझे जाना होगा।” माँ की आँखें छलछला गईं लेकिन होंठों पर कोई विरोध न था। माँ जानती थी कि यह विद्रोह नहीं, संकल्प है।

स्वीडन जाने से पहले जब वह दिल्ली में वीज़ा इंटरव्यू की तैयारी में लगी थी, एक दिन अचानक वही लड़का मिलने आ गया। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी, जिसमें कैंप की कविताएँ थीं।

“तुमने कभी पूछा नहीं कि मैंने वो पैसे क्यों दिए थे?” उसने धीमे स्वर में कहा।

वह चौंकी, पर संयमित रही, “क्योंकि तुम अच्छे इंसान हो।”

लड़का मुस्कराया, “मैं शायद प्रेम करता था… या करता हूँ… पर कभी ज़ाहिर नहीं किया क्योंकि तुम्हारे सपनों की ऊँचाई से मैं खुद को छोटा नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था तुम उड़ो, तुम्हारे परों में कोई मेरी आकांक्षा का बोझ न हो।”

उसने पहली बार उसकी आँखों में झाँक कर देखा। उसे वो वाक्य याद आया जो सेक्स वर्कर की बेटी ने एक बार स्कूल में लिखा था—“प्यार वो है जो राह में कांटे न बिछाए, चुपचाप झाड़ दे।”

स्वीडन में बिताया गया वह एक साल उसके जीवन का नया आधार बन गया। वहाँ उसे एक नई दुनिया मिली— जहाँ मुद्दे पर बात होती थी, व्यक्ति पर नहीं। जहाँ समाज सुधार की बातें फॉर्मल मीटिंग्स में नहीं, ज़मीनी काम से होती थीं। वहीं पर उसने पहली बार यह महसूस किया कि उसका जीवन तो बस एक शुरुआत है, उसे अब रुकना नहीं है।

भारत लौटने के बाद उसने एक संगठन की नींव रखी— माटी की बेटी”। इस संगठन ने सेक्स वर्कर्स के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालयों की शुरुआत की, स्वास्थ्य शिविरों का संचालन किया और सबसे बढ़कर— यौनकर्मियों के पुनर्वास पर ध्यान दिया। कई महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार से जोड़ा गया।

स्वीडन से लौटने पर जब उसने अपना संगठन शुरू किया, तो सबसे पहला व्यक्ति जो उसका साथ देने आया, वही गेहुँए रंग वाला लड़का था। उसने संगठन की वेबसाइट बनाई, डोक्यूमेंटेशन सम्भाला, प्रेज़ेंटेशन तैयार किए। जब उसके काम को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली, तो मंच पर उसका नाम कभी नहीं आया, पर वह हमेशा दर्शकों में बैठा मुस्कराता रहा।

एक रात नायिका ने उससे पूछा, “तुम अब तक क्यों रुके हो मेरे साथ?”

उसने कहा— “क्योंकि तुम्हारी लड़ाई में मुझे अपने भीतर की हर कायरता जलती दिखाई दी। और जब कोई और तुम्हारी पीठ पर हाथ रखता है, तो मुझे ईर्ष्या नहीं होती, गर्व होता है— क्योंकि मैं जानता हूँ तुम मेरी नहीं हो, लेकिन मैं तुम्हारे होने की गवाही में शामिल हूँ।”

वह न रोई, न हँसी। बस चुपचाप हाथ बढ़ा दिया— “तुम मेरे संगठन के सह-संस्थापक हो, अब से काग़ज़ों में भी। रिश्तों में नहीं तो इतिहास में तो तुम्हारा नाम होना चाहिए।”

वह गेहुएँ रंग वाला लड़का अब संगठन का अहम् हिस्सा है, लेकिन दोनों ने जीवन को स्नेह से आगे कभी बढ़ने न दिया। शायद एक छाया हमेशा उनके रिश्ते में बनी रही— उस मकसद की छाया, जिसे वे दोनों साझा करते थे।

एक दिन वह पुराने मोहल्ले में एक सेमिनार के सिलसिले में गई। वहीं से गुजरते हुए देखा कि उसके पुराने घर की दीवारें अब फूस की छत से ढँकी थीं। पता चला— पिता के रिटायर होते ही माँ की तबियत बिगड़ गई थी, और धीरे-धीरे सारी संपत्ति बिक गई। माँ अब भी उसी छत के नीचे रहती थी, लेकिन अब न चुप थीं न कमज़ोर। उसने बेटी को गले लगाया और कहा, “जिसे तू छोड़कर गई थी, वो ‘इज़्ज़त’ मैंने अब जाना है।”

वह मुस्कराई, आँसू पोंछे और माँ का हाथ थाम लिया।

आज उसके संगठन की शाखाएँ पाँच राज्यों में थीं। फेलोशिप, सम्मान, भाषण— सब उसके हिस्से आए, लेकिन जब किसी ने मंच से उसे ‘मसीहा’ कहा तो वह मुस्कराकर बोली—

मैं कोई मसीहा नहींएक ईंट हूँ उस फूस के मकबरे कीजिसे तुमने इज्ज़त के नाम पर खड़ा किया था। अब मैं उसे तोड़करनई नींव रखने आई हूँ—जहाँ इंसान की पहचान उसके काम से होकर्म से होशरीर से नहीं।”

© श्री सन्दीप तोमर

सम्पर्क – डी 2/1 जीवन पार्क, उत्तम नगर नई दिल्ली 110059, मोबाइल: 8377875009 ईमेल आईडी: gangdhari.sandy@gmail.com 

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Kishor Srivastava
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बढ़ियाँ कहानी 👏👏👏👏