डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ हिस्से का श्राद्ध ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“भैया, पंडित जी आ गए हैं। पिताजी का श्राद्ध शुरू करवा दें?” छोटे भाई ने फोन पर पूछा।
“हाँ, तुम सब संभाल लो। मैं पैसे भेज देता हूँ।”
“भैया, पैसे तो हर साल भेज देते हो। इस बार सोचा था, दोनों भाई साथ बैठकर पिताजी को याद करेंगे।”
“अरे, तुम तो वहीं रहते थे उनके पास। मैंने भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।”
“बिल्कुल भैया। लेकिन आखिरी दिनों में पिताजी तुम्हारा इंतज़ार करते रहे। कहते थे, बड़ा बेटा आएगा तो साथ खाना खाएँगे।”
उधर कुछ पल खामोशी रही।
“तुम्हें शिकायत है कि मैं नहीं आया?”
“नहीं भैया, शिकायत नहीं। बस एक बात समझ नहीं आती-आज पिताजी के नाम पर हम ब्राह्मण भोज करा रहे हैं, दान कर रहे हैं, लेकिन उनके जीते-जी उनके मन की इच्छा क्यों नहीं समझ पाए?”
“अब पुरानी बातें करने से क्या फायदा?”
“सही कह रहे हो। पिताजी भी यही कहते थे – बच्चों के बीच मनमुटाव न रहे। शायद इसीलिए अपनी बीमारी भी छिपाते रहे।”
फोन कट गया।
कुछ देर बाद बड़े भाई का संदेश आया-
“कल घर आ रहा हूँ। इस बार श्राद्ध की बची हुई रस्में नहीं, तुम्हारे साथ बैठकर पिताजी की बातें भी करेंगे।”
छोटे भाई ने संदेश पढ़ा और पिता की तस्वीर के सामने बैठ गया।
श्राद्ध की तिथि हर साल लौटती है, लेकिन क्या रिश्तों को जोड़ने का अवसर भी हम हर साल टालते रहेंगे?
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



