श्री रमाकांत ताम्रकार
☆ कविता – टीस अभी बाकी है ☆ श्री रमाकांत ताम्रकार ☆
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हम एक बाड़े में रहते थे
14 किरायेदारों का एक परिवार
और केवल तीन पाखाने
एक पर मकान मालिक
के दामाद का कब्जा
सिर्फ तेरह परिवार को केवल 2
और वह आती जर्जर काया वाली
साफ कर जाती तीनों पाखाने
बिल्कुल चमचमाते से
कोई उन्हें बुआ बोलता
तो कोई दादी
वह लोगों की बड़ी अम्मा
बड़ी बाई और न जाने
कितने रिश्तों में बँधी थी वो
हाँ हम बच्चों के लिए
लाती वह परचून की दुकान से
ठंडी मीठी पिपरमेंट की गोलियां
हम बड़े ही चाव से खाते
और वह हमसे एसे बतियाती
दुलारती जैसे हम उनके बच्चे हो
त्योहारों के समय उनकी
चौदह परिवार आवभगत करते
और तो और रक्षाबंधन पर
वह इन चौदह परिवारों के
मुँह बोले भाइयों को
पाट की राखी बांधती.
एक दिन वह बाड़ा बिक गया
सब तिरर बिरर हो गये.
और खो गए वो प्यारे रिश्ते
हम भी खो गए
दुनियां की स्याह गालियों में
पर प्रेम, स्नेह, अपनत्व की
टीस अभी भी बाकी है.
एक प्रकाश पुंज की तरह.
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© श्री रमाकान्त ताम्रकार
संपर्क – 423 कमला नेहरू नगर, जबलपुर।
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






