श्री हेमंत तारे
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बदलते मौसम…।)
☆ हेमंत साहित्य # ७४ ☆
बदलते मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
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एक पेड़ की
किसी डगाल पर
कुुछ पत्तियाँ हो चली है जर्द,
और उसी के सिरहाने
नई कोंपलें
खोल रही है स्वप्नील आँखें अपनी।
गिरने को तत्पर जर्द पत्तियाँ
जानती हैं, हवा की भाषा
वहीं,
कोंपलों ने अभी
शुरू की है अपनी भाषा गढ़नी ।
आँगन वही है,
चूल्हे की आँच वही,
बस धुएँ की दिशा
बदलती जान पडती है।
वो पगडंडियाँ,
जो बनी थी
दादा की आवक- जावक से,
पोता उन पर चलता तो है,
पर उसकी आँखें
खोजती है कोई नई राह
थके, सुस्त कदम
उसे पसंद नही
वो मुंतज़िर है सरपट दौड का।
नदी भी कहाँ
एक ही घाट से रहती है बंधी
युग- युगांतर तक।
सूरज अपनी जगह
अब भी अडिग है,
धरती अब भी
उसके चारों ओर घूम रही है;
और
अनंत काल से
होता आ रहा है
ॠतु परिवर्तन ।
यही तो है शाश्वत सत्य,
यही है प्रकृति का नियम।
पीढ़ियाँ भी
ऋतुओं की सगी है
एक जाती है,
तो दूसरी आती है,
पेड़ वही रहता है,
बस उसकी छाँव कि
भाषा बदल जाती है
ॠतुओं के साथ,
पीढियों के साथ।
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© श्री हेमंत तारे
मो. 8989792935
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




