डॉ. कृष्णलता सिंह
☆ “चौराहा…” – लेखक… श्री चन्द्रभान राही☆ समीक्षा – डॉ. कृष्णलता सिंह ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – चौराहा
लेखक – श्री चन्द्रभान राही
प्रकाशक – इन्द्रा प्रकाशन, भोपाल
☆ सामाजिक कुरीति का सच्चा आईना- ‘‘चौराहा’’ उपन्यास – डॉ. कृष्णलता सिंह ☆
यह सर्वमान्य सत्य है कि ‘‘साहित्य समाज का दर्पण होता है।’’ साहित्यकार पर समाज का यथार्थ स्वरूप दिखाने का उत्तरदायित्व होता है। इस कसौटी पर श्री चन्द्रभान राही जी का उपन्यास चौराहा खरा उतरता है। यह उनका चौथा उपन्यास है, जो इन्द्रा प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित हुआ है। यह कोढ़ की तरह फैली सामाजिक समस्या भिक्षावृत्ति पर एक शोधपरक उपन्यास है, जिसे लेखक ने भिखारी समुदाय के बीच घुस कर बड़े परिश्रम से लिखा है। अगर ऐसा नहीं होता, तो भिक्षा वृति में लिप्त भिखारियों के जीवन के संघर्षों, भिक्षावृत्ति के नये-नये तरीके, वेश्यावृत्ति, किन्नर समुदाय की विवशताओं और भिखारी माफिया तंत्र की एक एक गतिविधियों का ऐसा विस्तृत, जीवन्त और मार्मिक आख्यान हमारे सामने नहीं ला पाते। समाज का यह कोना इतना वीभत्स है, इसमें इतने छेद हैं कि उनमें पैबन्द लगाने में सदियाँ बीत जायेंगी। फिर भी सम्मवतःवहाँ सब कुछ सामान्य न हो सके। क्योंकि वह सब मानव निर्मित अपराध जगत की उपज है, जो एक व्यापार की शक्ल में फल फूल रहा है। इस व्यापार पर अंकुश लगाने वाले ही उनके संरक्षक हैं, जिसका शायद हम सब को कदाचित ही अहसास होगा। राही जी ने उसी अन्धेरे कोने से रूबरू कराने के लिये हमें ऐसे चौराहे पर ला कर खड़ा किया है, जो दिन रात वाहनों के शोर शराबे से गुलजार रहता है, हरी, पीली और लाल बत्ती से चलायमान होता है। हर तरफ चहल पहल नजर आती है। ज़िन्दगी भागती दौड़ती नज़र आती है, सब कुछ अपने आप में परफेक्ट दिखाई देता है। बस कुछ पलों के लिये लाल बत्ती का सिग्लन होते ही वाहनों की रफ्तार चौराहे पर थम जाती है और दूसरी ज़िन्दगी सक्रिय हो जाती है। अचानक प्रतीक्षारत वाहनों के शीशे थपथपाये जाने लगते हैं और भिखारी माफिया का पूर्व रिहर्सल किया गया अभिनय शुरू हो जाता है।
श्री चन्द्रभान राही
राही जी ने भले ही उपन्यास की पटकथा मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बोर्ड आफिस के चौराहे और हनुमान मंदिर के आस पास रहने वाले भिखारियों, धन्धेंवालियों और किन्नरों के जीवन की कहानियों को लेकर बुनी है, परन्तु यही गोरख धन्धा अपने देश के किसी भी छोटे-बड़े शहर के चौराहे और मंदिर के आस पास हम देख सकते हैं। यह गज़ब का धन्धा है, इसमें न हींग लगती है और न फिटकरी, रंगचोखा चढ़ता है यानी जीरो इंवेस्टमेन्ट का धन्धा व्यक्ति को धन्ना सेठ बना देता है। इस उपन्यास के भिखारियों का सरगना जलील ख़ान बाम्बे के किसी डॉन का कभी गुर्गा था। अब भोपाल में भिखारियों का गिरोह चलाता है। पुलिस और सत्ता में बैठे बड़े बड़े मंत्री उसकी जे़ब में रहते हैं। उसकी हवेली में उसकी पूरी सरकार चलती है, भिखारियों के अपने पैसों के लिये उसने एक बैंक भी खोल रखा है। अपनी कमाई वह वहाँ जमा करा देते हैं, अपना हिस्सा वह जब चाहे निकाल सकते हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी रक़म उनके मनोनीत उत्तराधिकारी को सौंप दी जाती है। लेन देन के मामले में वह बहुत ईमानदार है। ईमानदारी से काम करने वाले भिखारियों के लिये वह मसीहा हैं, लेकिन गद्दारी और बेईमानी करने के लिये वह जल्लाद है। सारा काम बड़े व्यवस्थित रूप से चलाता है। भिखारियों के मेकअप और कस्ट्यूम का अलग विभाग है। वह किसी पर भीख मांगने का दबाव नहीं डालता है। बच्चों के हुनर को जानकर वह उनकी योग्यता के अनुसार उनको रोजगार भी दिलाता है, लेखक ने जलीलख़ान के व्यक्तित्व के स्याह और उजले दोनों पक्षों को भी संजीदगी से उकेरा है। आश्चर्य होता है कि इस पात्र के अपराधिक चरित्र को पढ़कर घृणा नहीं उत्पन्न होती है। कहानी का मुख्य पात्र या सूत्र धार राम नाम का एक वयस्क युवक है, जिसकी ज़िन्दगी जन्म से लेकर अब तक इसी हनुमान मंदिर के पास बैठने वाले भिखारियों के बीच कटी है। अपनी वफादारी के कारण वह ख़ान का चहेता बन जाता है। उसे भीख माँगना रुचिकर नहीं लगता है, अतः खान उसे चौराहे पर अख़बार बेचने का काम दे देता है। उसकी जन्मदात्री माँ हमारे सभ्य समाज की एक शिक्षित युवती है, जो अपना पाप छिपाने के लिये एक कोढ़िन भिखारी के पास एक अख़बार में लपेट कर उसे छोड़ जाती है। कोढ़िन इसे पाँच हजार में ख़ान के पास बेच देती है और ख़ान उस बच्चे का पालन पोषण करने के लिये उसे हर महीने अतिरिक्त पैसा देता है। अख़बार में श्रीराम की फोटो छपी होती है, इसलिए ख़ान उसका नाम राम रख देता है। यही राम अपनी आप बीती सुनाते हुए भिखारियों की दिनचर्या, उनके संघर्ष और उनके रहन सहन के एक-एक दरवाजे और खिड़कियाँ खोलता जाता है और हम अपने ही समाज के इस अजीबो गरीब अंधेरी दुनिया में प्रवेश कर अवाक् रह जाते हैं। अकसर सड़क पर हमारी मुलाकात भिखारियों से होती है। कभी हम उनकी दयनीय दशा देख कर अपनी ज़ेब कुछ ढीली कर देते हैं, कभी उपेक्षा से मुँह फेर कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन लेखक उनके जीवन की गहराई में उतरा है, यह उपन्यास पढ़कर प्रतीत होता है। न जाने कितने भिखारी और भिखारिनें हैं, सबकी अलग-अलग जीवन गाथा है, कुछ तथाकथित सभ्य समाज की अवैध सन्तानें हैं, कुछ जन्मजात अनाथ हैं, जिन्हें उनके रिश्तेदार पैसों के लालच में बेच देते हैं। कोढ़ी, अपाहिजों को उनके परिवार वाले घर से निष्कासित कर देते हैं। अपने मन का आक्रोश छिपाये दर्द से जूझते हुए वह भीख मांगने पर मजबूर हो जाते हैं। हनुमान मंदिर के पीछे इनकी बस्ती बसी है। यहीं वह अपनी देह की ज़रूरतों की पूर्ति हेतु आपस में सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं, कुछ इन्हीं भिखारियों की अपनी संतानें हैं। इसी तरह देह व्यापार से जुड़ी धन्धें वालियाँ है, जिनकी अपनी विवशताएँ और कहानियाँ। समाज से उपेक्षित किन्नरों के जीवन की अपनी संघर्ष गाथा है। सबकी शरण स्थली यही चौराहा, जो इन्हें रोजगार देता है। इतनी सारे पात्रों, कथाओं और घटनाओं को एक सूत्र में पिरो कर राही जी ने बड़ी कुशलता से उपन्यास का तानाबाना गढ़ा है कि उसमें सभी पात्र और घटनाएँ सजीव हो उठती हैं। सिने रील की तरह आँखों के सामने सब कुछ गुजरने लगता है। पाठक एक सर्वथा नयी दुनिया में प्रवेश कर हक्काबक्का हो जाता है। जैसे जैसे उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है, उत्सुकता बढ़ती जाती है। उत्सुकता और कौतूहल कहीं पर भी विश्राम नहीं ले पाते हैं। उत्तरोत्तर हमारा परिचय एक नयी घटना और कहानी से होता रहता है, जो मन को बाँध लेती है। पात्रों की सर्जना इतनी विविधता पूर्ण है कि हर भिखारी दूसरे से अलग दिखाई देताहै। उनका रहन-सहन, दिनचर्या और मानवीय संबन्धों का लेखा जोखा मन को अन्दर तक भिगो देता है, आँखें नम हो जाती हैं। भिखारी होने के बावजूद उनमें इन्सानित है। आरती, कमला, कोढ़िन मौसी आदि की जीवन गाथामन को झकझोर देती हैं। उनकी हँसी और मसखरी के पीछे छिपा दर्द हृदय को कचोटने लगता है। राही जी ने बड़ी संवेदन शीलता और ईमानदारी से भिखारियों के जीवन का यथार्थ हमारे सामने रखा है।
उपन्यास का कथ्य न केवल रोचक है, अपितु शोधपरक नवीनता लिये हुए है। भाषा प्रवाहमयी है। अपने मन्तव्य को अभिव्यक्त करने में पूर्णता समर्थ है।राही जी ने भारी भरकम शब्दों की जगह साधारण आम जन की भाषा का प्रयोग किया है। सरल सारगर्भित शब्दों के प्रयोग से साधारणीकरण की प्रक्रिया को विस्तार मिला है, जिससे पात्र और पाठक का तादात्म्य सरलता से स्थापित हो जाता है। संवाद भी पात्रों के अनुकूल हैं। उनमें कोई बनावट नजर नहीं आती है। कुल मिला कर चन्द्रभान राही जी ने देश और समाज के लिये अभिशाप भिक्षावृति और उसके माफिया तंत्र का कुरूप आईना दिखाने की एक सफल ईमानदार प्रयास किया है, जो दिमाग को खरोचता है, विक्षोभ उत्पन्न करता है, मन तिलमिला उठता है कि यह भिक्षावृति का व्यवसाय कैसे पुलिस और नेताओं की सांठ गाँठ से माफिया तंत्र देश में चला रहा है? हम मूक् दर्शक बनकर सब कुछ देख रहे हैं। इस कलंक को हम मिटा नहीं पा रहे हैं। इन सब प्रश्नों के उत्तर भी इस उपन्यास में खोजने पर मिल जायेगा।
उपन्यास का आवरण आकर्षक और विषयानुकूल है। इन्द्रा प्रकाशन का मुद्रण भी सुन्दर है।
अन्त में इतना कहना चाहूँगी कि उपन्यास चौराहा अपने नवीन कलेवर, वस्तुविन्यास, रचनाशिल्प, प्रवाहमयी भाषा और सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण पठनीय है। देश और समाज के इतने बड़े कलंक और अभिशाप को हमारे सामने लाने के लिये श्री चन्द्रभान राही जी के इस साहासिक और ईमानदार कोशिश के लिये साधुवाद। साहित्यिक जगत में इसका हृदय से स्वागत होगा, इसी विश्वास के साथ।
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© डॉ. कृष्णलता सिंह
मोबाइल- 9971107736, ईमेल- klsingh@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈









बहुत बढ़िया समीक्षा। आप दोनों को बहुत बधाई