श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

प्रत्येक बुधवार और रविवार के सिवा प्रतिदिन श्री संजय भारद्वाज जी के विचारणीय आलेख एकात्मता के वैदिक अनुबंध : संदर्भ – उत्सव, मेला और तीर्थयात्रा   श्रृंखलाबद्ध देने का मानस है। कृपया आत्मसात कीजिये। 

? संजय दृष्टि – एकात्मता के वैदिक अनुबंध : संदर्भ- उत्सव, मेला और तीर्थयात्रा भाग – 10 ??

महाशिवरात्रि :

पौराणिक मान्यता है कि अग्नि लिंग से जगत जन्मा है। भगवान शंकर द्वारा हलाहल प्राशन के उपरांत उन्हें जगाये रखने के लिए रात भर देवताओं द्वारा गीत-संगीत का आयोजन किया गया था। आधुनिक चिकित्साविज्ञान भी विष को फैलने से रोकने के लिए ‘जागते रहो’ का सूत्र देता है। ‘शिव’ भाव हो तो अमृत नहीं विष पचाकर भी कालजयी हुआ जा सकता है। इस संदर्भ में इन पंक्तियों के लेखक की यह कविता देखिए,

कालजयी होने की लिप्सा में

बूँद भर अमृत के लिए वे लड़ते-मरते रहे,

उधर हलाहल पीकर महादेव, त्रिकाल भए।

महाकाल का परिवार, एकात्मता का कालजयी उदाहरण है। यदि शिव परिवार के पशु सदस्यों के वाहन और शब्दों वजी के गले में लिपटा सर्प देखें तो एकात्म भाव होकर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व से जीने का अद्भुत उदाहरण दिखेगा। गणेश जी का वाहन है, मूषक। सर्प का आहार है मूषक। सर्प को आहार बनाता है मयूर जो कार्तिकेय जी का वाहन है। महादेव की सवारी है नंदी। नंदी का शत्रु है गौरा जी का वाहन शेर। संदेश स्पष्ट है कि दृष्टि में एकात्म भाव हो तो एक-दूसरे का भक्ष्ण करने वाले पशु भी एकसाथ रह सकते हैं। एकात्मता, वैदिक दर्शन के प्रत्येक रजकण में दृष्टिगोचर होती है।

धूलिवंदन/ होली :

होली अर्थात विभिन्न रंगों का साथ आना। साथ आना अर्थात एकात्म होना। रंग लगाना अर्थात अपने रंग या अपनी सोच अथवा विचार में रँगना। विभिन्न रंगों से रँगा व्यक्ति जानता है कि उसका विचार ही अंतिम नहीं है। रंग लगानेवाला स्वयं भी सामासिकता और एकात्मता के रंग में रँगता चला जाता है। रंगोत्सव की यह प्रथा मानो मेहंदी लगाने जैसी है। कबीर लिखते हैं,

लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल ।

लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥

रँगना भी ऐसा कि रँगा सियार भी हृदय परिवर्तन के लिए विवश हो जाए। यही कारण है कि होली क्षमापना का भी पर्व है।  क्षमापना अर्थात वर्षभर की ईर्ष्या मत्सर, शत्रुता को भूलकर सहयोग- समन्वय का नया आरंभ करना। होली या फाग हमारी  सामासिकता का इंद्रधनुषी प्रतीक है।

क्रमश: ….

©  संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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लतिका

विष निवारण पर महत्वपूर्ण जानकारी।
रंगों का त्यौहार होली जीवन की सकारात्मकता। बधाई!

अलका अग्रवाल

महाकाल का परिवार व होली का त्योहार एकात्मता और सामाजिकता का सुंदर उदाहरण है। अप्रतिम आलेख।

माया कटारा

कण- कण में व्याप्त एकात्मकता को दर्शाती रचना
शिवरात्रि , होली – सामाजिकता के द्योतक हैं ,
बधाई के पात्र हैं रचनाकार …… उत्सवधर्मिता स्तुत्य है, दर्पण है सामूहिकता…