श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ।)
बस यूँ ही, बैठे ठाले:-
☆ शेष कुशल # ६७ ☆
☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” – शांतिलाल जैन ☆
थैंक यू मि. स्टीव चेन, आपने स्किप का बटन बनाया. न बनाया होता तो चिढ़, खीज और झुँझलाहट के मारे अपन इतने बाल नोंच चुके होते कि आनेवाले सात जन्मों तक गंजे ही जन्म लेते.
सोचिए श्रीमान्. आप यू-ट्यूब पर हैं. डियर शशांक दुबे की रिकमंडेशन पर, शंकर-जयकिशन की धुन पर, लता मंगेशकर के गाने पर झूम रहे हैं. ‘अज़ीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू..’ कि एक चीनी मास्टर आपको रोज़ाना 15 मिनट ताई-ची करने को कह रहा है. अनचाहे ही, थोड़ी-थोड़ी देर में वो आपसे मुख़ातिब होता है, बाहर झूलती तोंद से निजात दिलाने का पैकेज आपको बेचना चाहता है. आप खीजते हैं, झल्लाते हैं, फिर स्क्रीन पर स्किप बटन के उभरने का बेसब्री से इंतिज़ार करते हैं. अब आपने साँस रोक ली है, चौकन्ने हो गए हैं, पूरी एकाग्रता से तर्जनी तैयार करके रखी है, स्किप का बटन उभरा और आपने दबाया. थैंक गॉड. राहत की एक लम्बी सांस ले पाए आप. कॉकरोच जैसी जीजिविषा वाले विज्ञापनों को आप किल तो नहीं कर पाए मगर कुछ देर के लिए निजात पा लेते हैं. वे फिर आएँगे. बार-बार आएँगे. तर्जनी अभिशप्त है. वो ईवीएम का बटन दबाए कि स्किप का – जिन्हें हटाना चाहती है वे ही बार बार लौट आते हैं.
स्किप एक जिद्दी बटन है श्रीमान्. समय से पहले हटेगा नहीं. टाईमर लगा होता है. स्किप ऐड इन फ़ाईव सेकंड्स. यही पाँच सेकंड्स आपके सुभाव में सेरेनिटी, आपके धैर्य, आपकी सहनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं. आप फेल भी हो सकते हैं. फिंगर है श्रीमान्, टारगेट से चूकी और एक विज्ञापन सा खुल जाता है, आप संसार के सबसे लक्की फेलो हैं. बस एक क्लिक और!! ये आपकी दुनिया बदल सकता है. जीवन में हर कष्ट स्थायी नहीं होता, कुछ कष्ट केवल पाँच सेकंड्स के होते हैं, लेकिन दिन में कई-कई बार होते हैं. निदान की शर्त बस इतनी कि आपकी नज़र स्क्रीन पर बनी रहे और आपकी अंगुली सही समय पर सही स्थान पर पहुँचे.
इन दिनों राष्ट्रीय प्रतीकों के बदलने की बहस सी चल रही है. स्किप बटन को राष्ट्रीय बटन घोषित करने का यही सही समय है. स्किप सही मायनों में समाजवादी, लोकत्रांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष बटन जो ठहरा. संविधान के अनुच्छेद 15 का अनुपालन करता है. धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करता. स्त्री पुरुष, गरीब अमीर, शहरी ग्रामीण, अगड़ों-पिछड़ों के, सबके फोन में समभाव से उभरता है. ये भजन के बीच भी उसी शिद्दत से उभर आता है जिस शिद्दत से गुरबानी, कव्वाली या साम-गीत के दौरान उभरता है. जाने किस धातु का बना है, रात में भी आराम नहीं करता. जब आप भारत में सो रहे होते हैं तब ग्लोब के दूसरी ओर की दुनिया के लोग इसे दबा रहे होते हैं. ईडन गार्डन से सिलिकॉन वैली तक मानव सभ्यता के सफ़र में सबसे ज्यादा दबाए जानेवाला बटन कोई है तो वो स्किप का बटन है. आदम और हव्वा के बीच सेब तो अब भी एक ही है, मोबाईल दो हो गए है. सेब तो बाद में भी खा लेंगे फ़िलवक्त दोनों अपने अपने स्किप दबाने में बिजी हैं. अंगुली और स्किप बटन के बीच जुगलबंदी कुदरत की सबसे बड़ी सौगात है.
एक अनुमान है कि दुनियाभर में तर्जनियाँ एक दिन में कोई टेन मिलियन टाईम्स तो स्किप का बटन दबा ही लेती हैं. इंसा इन दिनों परमात्मा को कम याद करता है, स्किप ज्यादा दबाता है. लोग सारांश पढ़ते हैं, किताबें स्किप कर जाते हैं. रील देखते हैं, व्याख्यान स्किप कर जाते हैं. हेडलाइन पढ़ते हैं, विश्लेषण स्किप कर जाते हैं. स्किप संस्कृति की जकड़ में है समय समाज. बाज़ार ने सभ्यता के दाएँ कोने में एक अदृश्य स्किप बटन लगा दिया है, जहाँ सिर्फ मैं और मेरी पसंद ही मायने रखती हैं बाकी कसमें-वादे, प्यार-वफ़ा, रिश्ते-नाते सब कुछ स्किप किए जा सकते हैं.
स्किप स्कूल के जमाने में अपन का सबसे पसंदीदा एक्शन हुआ करे था, क्लास स्किप करना सबसे पसंदीदा शग़ल था, बेंत की मार पड़ा करती थी. पिताजी को भी हमें जुतियाने का चाहत भरा अवसर मिल जाया करता. इसके बावजूद स्किप अपन का पसंदीदा एक्शन बना रहा. आज भी सबसे पसंदीदा एक्शन है. थैंक यू मि.स्टीव चेन.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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