श्री संजय भारद्वाज 

 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 24☆

☆ पहाड़ ☆

‘पहाड़ के पार एक एक राक्षस रहता है। उसकी सीमा में प्रवेश करने वालों को वह खा जाता है।’ बचपन में सुनी कहानियों में प्रायः इस राक्षस का उल्लेख मिलता है। बालमन यों भी कच्चा होता है। जो उकेरा गया, वह अंकित हो गया। यह अंकित डर जीवन भर पहाड़ लांघने नहीं देता।

मज़े की बात यह है कि पहाड़ के उस पार रहने वालों के बीच, इस पार के राक्षस के किस्से हैं। इस पार हो या उस पार, पार उतरने वाले नगण्य ही होते हैं।

पहाड़ भौगोलिक संरचना भर है। जलवायु को अधिनियमित करने और प्रकृति के संतुलन के लिए पहाड़ होना चाहिए, सो है। पहाड़ को पार किया जा सकता है। थोड़ा अपभ्रंश का सहारा लिया जाए तो पहाड़, पहार, पार…! जिन्हें पार किया जा सकता है, वे ही पहाड़ हैं। ये बात अलग है पृथ्वी पर के पहाड़ों की सफल चढ़ाई करनेवालों में भी बिरले ही हैं जो मन का पहाड़ पार कर पाए हों।

मन के पहाड़ कई प्रकार के होते हैं। वर्जना से ग्रस्त, लांछना से भयभीत। वर्जना और लांछना, वांछना से दूर करते हैं। परिणामस्वरूप खंडित व्यक्तित्व जन्म लेने लगता है।

किसी कार्य के संदर्भ में एक उपासिका से मिलने गया। उन्हीं के एक ग्रंथ का काम था। वे प्रवचन कर रही थीं। प्रवचन उपरांत चर्चा हुई। कुछ पृष्ठ मैंने उन्हें दिये। पृष्ठ देते समय उनकी अंगुली से स्पर्श हो गया होगा। मुझे तो पता भी नहीं चला पर वे असहज हो उठीं। सहज होने में कुछ समय लगा। पता चला कि पंथ के नियमानुसार उपासिका के लिए पुरुष का स्पर्श वर्जित है।

सत्य तो यह है कि स्त्री या पुरुष का क्रमशः पुरुष या स्त्री से स्पर्श एक विशिष्ट भाव जगाता है, यह वर्जना उनके अभ्यास में कूट-कूट कर भर दी गई थी। धर्म के पथ पर जिस ईश्वर की आराधना की जा रही है, अधिकांश पंथों में वह पुरुष देहाकार ही है। पुरुष होना दैहिक रचना है, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, नाना, पुत्र या पति होना आत्मिक भाव है। स्पर्श के पार का राक्षस उपासिका के मन में बसा दिया गया था। फलतः उनके चेहरे पर कुछ देर भय छलका था।

मनुष्य का सामर्थ्य अपार है, बस वह पार जाने का मन बना ले। साथ चाहिए तो एक समर्थ मित्र, गुरु या मार्गदर्शक चुने। मार्गदर्शक भी ऐसा जो आगे नहीं, साथ चले। जिसके सानिध्य में एक निश्चित दूरी के बाद पथिक को भी मार्ग का दर्शन होने लगे। मार्गदर्शन होने लगे तो पहाड़ के पार जाना कौनसा पहाड़-सा काम है!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

(विनम्र सूचना- ‘संजय उवाच’ के व्याख्यानों के लिए 9890122603 पर सम्पर्क किया जा सकता है।)

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