श्री एस के कपूर “श्री हंस”
☆ “श्री हंस” साहित्य # १७६ ☆
☆ गीत ।। आज मानव की मानवता ही मर गई है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆
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आज मानव की मानवता ही मर गई है।
आज मनुष्य से जैसे मानवता ही डर गई है।।
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कैसी घड़ी आई है दानवता की आज।
आदमी ही नहीं सुनता आदमी की आवाज।।
कैसा जादू यह आधुनिकता कर गई है।
आज मानव की मानवता ही मर गई है।।
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आज हालात की वजह से निर्णय बदल रहें हैं।
मानवता मापदंड भी आज नए चल रहे हैं।।
मनुष्य के पाप की लुटिया भी आज भर गई है।
आज मानव की मानवता ही मर गई है।।
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हवा पानी चरित्र आचरण दूषित कर दिया है।
प्रेम का घड़ा भी घृणा से ही भर दिया है।।
अंदर अपने आज बस नफरत कर घर गई है।
आज मानव की मानवता ही मर गई है।।
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आज आदमी की हर बात बनावटी हो गई है।
चेहरे पर चेहरे से शक्ल दिखावटी हो गई है।।
नई उमर की नई फसल भी आज बिखर गई है।
आज मानव की मानवता ही मर गई है।।
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© एस के कपूर “श्री हंस”
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