डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस #३
कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
मुझको हरा ही हरा दिख रहा है,
मैं सावन का अंधा हुआ जा रहा हूँ।
प्रभारों के बोझों से मैं यूँ लदा हूँ,
हम्मालों का कंधा हुआ जा रहा हूँ।
=2=
रँगा न लहू से वो अख़बार कैसा,
हिंसा-कत्ल-चोरी,कपट काला पैसा।
कालाबाज़ारी-दलालों की मण्डी,
मैं उफ़ गोरखधंधा हुआ जा रहा हूँ।
=3=
डायनिंग सैट,सोफा,किचन सैट सब हैं,
अपसैट माइण्ड, चुप्पी साधे लब हैं।
फँसते चुनिंदा ही जालों के फंदे,
मैं बेबस परिंदा हुआ जा रहा हूँ।
=4=
चंदा जुटाने में मशगूल बंदा,
दुनिया बखाने,भले इसको गंदा l
मुनाफ़े की अब न गुंजाइश तनिक भी,
मैं बिज़निस इक मंदा हुआ जा रहा हूँll
=5=
‘राजेश’ मन-ही-मन बेशुमार प्यार भी,
पर हो न पाया कभी दिल से इज़हार भी।
चुपके तकिये में छुपा के पढ़ें कई,
मैं यूँ गुलशन नंदा हुआ जा रहा हूँ॥
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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