श्री एस के कपूर “श्री हंस”
☆ “श्री हंस” साहित्य # १७७ ☆
☆ मुक्तक ।। असंभव भी हो सकता है संभव ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆
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=1=
मिट्टी से बना तन यूं चलते-चलते ही रुक जाता है।
मत नाज़ कर कि यह भी एक दिन झुक जाता है।।
व्यक्ति चला जाता लेकिन बात उसकी है रह जाती।
कर्म अच्छे कर एक दिन यह तन भी चुक जाता है।।
=2=
व्यक्तित्व यूं ऊँचा बनाओ सब सुनने को तैयार रहें।
आकर्षण हो शख्सियत में कि सब वफादार रहें।।
जब बढ़ो आगे तो कारवाँ पीछे-पीछे चल निकले।
मानने को बात आपकी तैयार सारा संसार रहे।।
=3=
दुआयें सबकी लेते रहो दुआयें सबको देते रहो।
अपने परायों का भी आशीर्वाद तुम लेते रहो।।
न जाने कब जिन्दगी की आखिरी शाम आ जाए।
सब से निभाकर चलने की बात सदा कहते रहो।।
=4=
पराजय तब होती जब आप हार को मान लेते हैं।
जीत तो निश्चित जब बात यह आप जान लेते हैं।।
गिर कर फिर से खड़े होने में ही छिपी है जीत।
असंभव भी सम्भव जब चुनौती प्रण ठान लेते हैं।।
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© एस के कपूर “श्री हंस”
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