आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा का रंग आँसू के संग।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५१ ☆

☆ दोहा का रंग आँसू के संग ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

आँसू टँसुए अश्रु टिअर, अश्क विविध हैं नाम

नयन-नीर निरपेक्ष रह, दें सुख-दुःख पैगाम

*

भाषा अक्षर शब्द नत, चखा हार का स्वाद

कर न सके किंचित कभी, आँसू का अनुवाद

*

आह-वाह-परवाह से, आँसू रहता दूर

कर्म धर्म का मर्म है, कहे भाव-संतूर

*

घर दर आँगन परछियाँ, तेरी-मेरी भिन्न

साझा आँसू की फसल, करती हमें अभिन्न

*

आल्हा का आँसू छिपा, कजरी का दृष्टव्य

भजन-प्रार्थना कर हुआ, शांत सुखद भवितव्य

*

आँसू शोभा आँख की, रहे नयन की कोर

गिरे-बहे जब-तब न हो, ऐसी संध्या-भोर

*

मैं-तुम मिल जब हम हुए, आँसू खुश था खूब

जब बँट हम मैं-तुम हुए, गया शोक में डूब

*

आँसू ने हरदम रखा, खुद में दृढ़ विश्वास

सुख-दुःख दोहा-सोरठा, आँसू है अनुप्रास

*

ममता माया मोह में, आँसू करे निवास

क्षोभ उपेक्षा दर्द दुःख, कुछ पल मात्र प्रवास

*

आँसू के संसार से, मैल-मिलावट दूर

जो न बहा पाये ‘सलिल’, बदनसीब-बेनूर

*

इसे अगर काँटा चुभे, उसको होती पीर

आँसू इसकी आँख का, उसको करे अधीर

*

आँसू के सैलाब में, डूबा वह तैराक

नेह-नर्मदा का क़िया, जिसने दामन चाक

*

आँसू से अठखेलियाँ, करिए नहीं जनाब

तनिक बहाना पड़े तो, खो जाएगी आब

*

लोहे से कर सामना, दे पत्थर को फोड़

‘सलिल’ सूरमा देखकर, आँसू ले मुँह मोड़

*

बहे काल के गाल पर, आँसू बनकर कौन?

राधा मीरा द्रौपदी, मोहन सोचें मौन

*

धूप-छाँव का जब हुआ, आँसू को अभ्यास

सुख-दुःख प्रति समभाव है, एक त्रास-परिहास

*

सुख का रिश्ता है क्षणिक, दुःख का अप्रिय न चाह

आँसू का मुसकान सँग, रिश्ता दीर्घ-अथाह

*

तर्क न देखे भावना, बुद्धि करे अन्याय

न्याय संग सद्भावना, आँसू का अभिप्राय

*

मलहम बनकर घाव का, ठीक करे हर चोट

आँसू दिल का दर्द हर, दूर करे हर खोट

*

मन के प्रेशर कुकर में, बढ़ जाता जब दाब

आँसू सेफ्टी वाल्व बन, करता दूर दबाव

*

बहे न आँसू आँख से, रहे न दिल में आह

किसको किससे क्या पड़ी, कौन करे परवाह?

*

आँसू के दरबार में, इक सां शाह-फ़क़ीर

भेद-भाव होता नहीं, ख़ास न कहीं हक़ीर

*

धाँसू-फाँसू भी बहा, आँसू होते दीन

नहीं बहाती आँख से, आँसू किंचित मीन

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©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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