श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “रुकना नहीं” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # ११९ ☆ रुकना नहीं ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

कौन पीछे रह गया

यह सोच कर रुकना नहीं है ।

 

बढ़ तू आगे निरंतर

गतिमान यह सारा जगत

मोड़ घिरता राहों से

हो जाता ओझल है अगत

 

विपत्ति कोई भी आए

इनसे मगर डरना नहीं है।

 

आगे दुविधा के महल

कुछ लोभ के वातावरण

मन लुभाएँगे तेरा

जाना नहीं इनकी शरण

 

बहुत मिल जाए यदि

बस बैठ कर चुकना नहीं है।

 

सफ़र मुश्किल भरा हो

पर मंज़िलों को खोजना

मुँह चिढ़ाएँ अड़चनें

बढ़ते पाँव पर न रोकना

 

हवाएँ विपरीत हों पर

बस सामने झुकना नहीं है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

७.१०.२५

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted