श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – माँ पर दोहे… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८१ ☆
☆ माँ पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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जग की तपती धूप में, माँ शीतल सी छाँव|
माँ की थपकी प्रिय लगे, सबसे सुंदर ठाँव||
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सेवा करती मौन हो, करती नहीं सवाल|
विमुख न होती कर्म से, रखती सदा खयाल||
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तुझसे माँ साँसे मिलीं, तू जीवन संगीत|
तू रिश्तों की है धुरी, तू निश्छल सी प्रीत||
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तेरे चरणों में बसें, गीता और कुरान|
तू ही जीवन दायिनी, तू ही है भगवान||
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पाठ मिला संस्कार का, तुझसे मिलता ज्ञान|
तुम से घर की रौनकें, तुम ही घर की शान||
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माँ मूरत है नेह की, माँ ही भजन अजान|
माँ से बढ़कर जगत में, दूजा नहीं महान||
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जन्म दायिनी कोख का, करें न हम अपमान|
माँ ईश्वर इस जगत में, माँ का रखिए मान||
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रहते घर में जो सदा, मात -पिता के पास|
उनकी सेवा से मिटे, जीवन के संत्रास||
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माँ की सेवा से मिले, हमें शांति संतोष|
उनके ही आशीष से, बढ़ता सुख का कोष||
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





