श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल साहित्य – “जानलुई का सपना – टेलीविज़न ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१ ☆
☆ बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
जानलुई एक होटल में बैठा था। वह नाश्ता करने आया था। पास रेडियो पर गाना आ रहा था।
जानलुई गाना सुन रहा था। तभी उसके ध्यान में आया कि जब रेडियो में गाना दूसरे स्टेशन से आ सकता है तो इसी तरह चित्र भी हवा में क्यों नहीं आ सकते? यह सोचकर जानलुई वहाँ से उठा और पर चल दिया।
पर आ कर उसने रेडियो की कार्यविधि का अध्ययन किया। कही से कांच, घूमने वाला चक्का, वायर, बैटरी आदि सामान एकत्र कर के प्रयोग करने लगा।
चुंकि जानलुई को बचपन से फोटोग्राफी का शौक था। इसलिये यह फोटो और आवाज को एक साध यंत्र में लाना चाहता था।
इसी कोशिश में वह दिन-रात मेहनत करता रहा। एक कमरे में कैमरा लगा दिया। उसमें कुछ परिवर्तन किया। जिस तरह रेडियो की आवाज को विद्युत तरंग में बदलने की कोशिश की जाती है।
कुछ दिनों तक लगातार कोशिश करने के बाद वह इस कार्य में सफल हो गया। तब उसने दूसरे कमरे में चमकीले शीशे लगा कर उसके पीछे एक चक्का लगाया, जो एक मोटर से घूमता था। इसे कई यंत्रों से जोड़ कर तैयार किया गया था।
जानलुई ने कैमरे के सामने रंगीन गुड़िया रख दी। जिस के ऊपर फोकस से प्रकाश डाला गया। तब दूसरे कमरे में जा कर शीशे पर चित्र प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया।
बहुत कोशिश के बाद जानलुई चित्र को विद्युत तरंग से वापस चित्र प्राप्त करने में सफल हो गया। उसने यह चित्र एक सामान्य सिद्धांत को कार्य में बदल कर प्राप्त किया, जिस के अनुसार पहले चित्र को कैमरे में प्राप्त कर के विद्युत तरंग में बदला जाता है। फिर विद्युत तरंग को वापस चित्र में बदल दिया जाता है।
जानलुई द्वारा प्राप्त किए गए चित्र साफ नहीं आ रहे थे। इसलिये यह उन्हें साफ प्राप्त करने की कोशिश करने लगा।
उसके कमरे में तारों का जाल फैला हुआ था। वह उन्हें सावधानी से पार करता था।मगर, एक तार से उलझ गया, जिससे कमरे की खिड़की खुल गई।
एक हजार बैटरियों का प्रकाश सड़क पर फैल गया। लोग इकट्ठे हो गए। कोलाहल सुनकर मकान मालिक आ गया। उसने जानलुई को घर से निकाल दिया। तब जानलुई अपना सामान लेकर लंदन आ गया। जहाँ उसने अपना प्रयोग वापस दोहराया।
इस हेतु वह एक लड़के को ले कर आया। जिसे कमरे के सामने खड़ा किया। पर वह लड़का तेज प्रकाश देखकर घबरा गया और प्रकाश से दूर हट गया।
उधर जानलुई को कोई चित्र प्राप्त नहीं हो रहा था। वह पुनः कमरे में आया। देखा, लड़का प्रकाश से अलग खड़ा था।
“अरे भाई, डरो मत!” जानलुई ने जेब से कुछ रुपये निकाल कर लड़के को दिये.” तुम्हें कुछ नहीं होगा।”
फिर वह दूसरे कमरे में आ कर प्रयोग करने लगा। उसका प्रयोग सफल रहा। वह स्पष्ट चित्र प्राप्त करने में कामयाब हो चुका था।
इस तरह कई साल तक प्रयोग करने के बाद जानलुई बेयर्ड टेलीविजन का आविष्कार करने में सफल हुआ। यह आविष्कार उसकी अथक मेहनत का परिणाम है।
© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
16-07-2024
संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226
ईमेल – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




