डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०३ ☆
☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆
‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/ ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/
ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।
रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।
‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।
भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’
सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।
दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।
महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों, नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।
संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।
काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।
वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।
तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।
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© डा. मुक्ता
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