श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५९ ☆ देश-परदेश – पशु बनाम परिवार प्रेम ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पशु प्रेम और पालतू पशु प्रेम के मायने अलग है। समाज में कुछ लोग पशु प्रेमी होते हैं। दुसरी तरफ कुछ लोग पालतू पशु प्रेमी श्रेणी में आते हैं।
वर्तमान में जब मानव अपने परिवार, समाज और यहां तक की अपनी मातृ भूमि से भी अधिक प्यार अपने पालतू पशु को करने लग गया हैं।
पूर्व में लोग पालतू पशु शौकिया तौर से पाला करते थे। आज लोग पालतू पशु सोशल मीडिया के लिए भी पाल रहें हैं। परिवार और अपनों से दूरी बढ़ा कर पालतुओं से नजदीकियां बन रहीं हैं।
पालतू पालक बनना कोई गलत बात नहीं हैं, लेकिन परिवार और समाज की उपेक्षा करना भी किसी भी एंगल से अच्छा नहीं कहा जा सकता हैं। इससे बेहतर तो पशु प्रेमी लोग हैं।
मानव योनि में जन्म लेकर अपने ही समाज के उत्थान में योगदान ना कर, सिर्फ पालतू पशुओं का कल्याण करना, कभी भी उचित नहीं माना जाएगा।
आजकल लोग मां और बाप को बुढ़ापे में लावारिस छोड़ अपने पालतू पशुओं को अपना रहें हैं। कुछ युवा दंपती तो हद पार कर, अपना परिवार भी नहीं बना रहें हैं, जीवन का सब कुछ पालतू को समर्पित कर रहे हैं। इसी क्रम में कुछ युवा विवाह जैसी पवित्र संस्था के बंधन से मुक्त रह कर सृष्टि को ही समाप्त करने की मुहिम में योगदान कर रहें हैं।
समाज को भी सोचना होगा कि युवा पीढ़ी ऐसे कदम उठाने के लिए क्यों अग्रसर हो रही हैं।
© श्री राकेश कुमार
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