श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २७१ ☆ हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश… ☆
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नव वर्ष आया द्वार पे
आशा की चादर ओढ़कर।
बीते दुखों छोड़कर
बंधन कटीले तोड़कर।।
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हर दिन जगे विश्वास ऐसा,
भोर होवे प्रेममय ।
जीवन पथिक बनते हुए
होगी सदा जय की विजय ।।
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उम्मीद की डोरी पकड़
हाथों में थामें फूल को।
पहला कदम रखते ही जागे
भूलिए मत मूल को ।।
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तय किया जब लक्ष्य पाना
वर्ष नव उत्कर्ष हो ।
गूँजती मंगल ध्वनि तो
क्यों न सबको हर्ष हो।।
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नया वर्ष केवल कैलेंडर न बदले हमारी आदतें भी हरी हो जाएँ। पौधे लगाना,पेड़ बचाना यही सच्चा संकल्प बन जाए।जब धरती मुस्कुराएगी,तभी मन को सुकून आएगा।प्रकृति की रक्षा करेंगे हम,तो भविष्य सुरक्षित होगा।आइए इस वर्षहर श्वास में हरियाली,हर कर्म में प्रकृति,और हर दिन ग्रीन मोटिवेशन अपनाएँ।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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