श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६१ ☆ देश-परदेश – झूठ के पांव नहीं होते ☆ श्री राकेश कुमार ☆
ये किवदंती सुनकर भी हम लोगों ने झूठ बोलना बंद नहीं किया है। सदियों से इस बात की जानकारी होते हुए भी झूठ बोलते ही रहते हैं। ऊपर लगी समाचार पत्र की कटिंग भी शायद ये ही कुछ कह रही है।
एक व्यक्ति ने पैर दर्द के कारण अवकाश लिया था, परंतु उसी दिन उस व्यक्ति ने 16 हजार कदम भी चले। इस कारण उसकी नौकरी जाती रही।
निजी तौर से हमें ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा है। 16 हजार कदम चलने के लिए उसे पुरस्कृत किया जाना चाहिए था। हम तो विगत 16 वर्षों से 16 हजार कदम चलने की योजना तक नहीं बना पा रहें हैं। स्वास्थ्य विज्ञान के ज्ञानी लोग तो कम से कम दस हज़ार कदमों की वकालत करते आ रहें हैं। हम अभी तक एक दिन में अधिकतम आठ हजार कदम चले थे, उसकी खुशी में आठ गुलाब जामुन डाकर गए थे।
कभी कभी तो हम अपने सहायक को कदम नापने वाली घड़ी पहना देते हैं। हमारे इस एक कदम से उसके द्वारा लिए गए कदम, हमारे खाते में जुड़ जाते हैं। क्या करें हम से तो कदमताल भी नहीं की जा सकती है, फिर ये पांच अंकों के आंकड़े को एक दिन में प्राप्त करना, अत्यंत कठिन होता है।
हमारे एक शुभ चिंतक तो हमें सांत्वना देते हुए कहते हैं, दिन भर में मोबाइल पर यदि दस हजार बार उंगली भी चल जाए, तो उसको कदम के बराबर माना जाता हैं।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए पैदल चलना ही सर्वोत्तम है। ऐसा कह देना या व्हाट्स ऐप पर लिख देने से कोई लाभ नहीं होता है। हम तो अब आज की रात्रि सैर करेंगे, आप भी अब मोबाइल बंद कर देवें।
© श्री राकेश कुमार
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