श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – पर पापा कभी नहीं बदले”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०५ – सजल – पर पापा कभी नहीं बदले ☆

(पदांत- पर पापा कभी नहीं बदले, मात्रा भार- 16+16=32)

☆

सालों गुजरे ऋतुएं बदलीं,  पर पापा कभी नहीं बदले।

पेंट शर्ट बंडी भी पहनीं,पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

दृढ़ के पक्के सीधे सादे, बाल हुए चाँदी के तब भी।

जग ने आव-भगत को छोड़ा, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

बिछुड़ गए थे दांत सभी पर, हँसी ठहाका कभी न छूटा।

फटी जेब खाली ही रहती, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

बड़ा हुआ जब बेटा उनका, पैर समाया उनका जूता।

डाँट पिलाते रहते कड़़वी, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

हर कदमों पर हाथ थामते, ठोकर लगती कभी न गिरता।

तेज कदम से आगे चलते, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

कहते बेटा भोला भाला, छल छद्मों का चढ़ा है पारा।

अब मैं भी पापा बना हुआ, पर पापा कभी नहीं बदले।।

* 

यादों की अब लिए पोटली, जीवन पथ पर बढ़ता जाता ।

पथ-भटका तो राह दिखाई, पर पापा कभी नहीं बदले।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

26/12/25

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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