श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – पर पापा कभी नहीं बदले”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २०५ – सजल – पर पापा कभी नहीं बदले ☆
(पदांत- पर पापा कभी नहीं बदले, मात्रा भार- 16+16=32)
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सालों गुजरे ऋतुएं बदलीं, पर पापा कभी नहीं बदले।
पेंट शर्ट बंडी भी पहनीं,पर पापा कभी नहीं बदले।।
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दृढ़ के पक्के सीधे सादे, बाल हुए चाँदी के तब भी।
जग ने आव-भगत को छोड़ा, पर पापा कभी नहीं बदले।।
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बिछुड़ गए थे दांत सभी पर, हँसी ठहाका कभी न छूटा।
फटी जेब खाली ही रहती, पर पापा कभी नहीं बदले।।
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बड़ा हुआ जब बेटा उनका, पैर समाया उनका जूता।
डाँट पिलाते रहते कड़़वी, पर पापा कभी नहीं बदले।।
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हर कदमों पर हाथ थामते, ठोकर लगती कभी न गिरता।
तेज कदम से आगे चलते, पर पापा कभी नहीं बदले।।
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कहते बेटा भोला भाला, छल छद्मों का चढ़ा है पारा।
अब मैं भी पापा बना हुआ, पर पापा कभी नहीं बदले।।
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यादों की अब लिए पोटली, जीवन पथ पर बढ़ता जाता ।
पथ-भटका तो राह दिखाई, पर पापा कभी नहीं बदले।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
26/12/25
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