श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना ऋतुराज बसंत सुहावन लागे…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २७४ ☆ बसंत पंचमी विशेष – ऋतुराज बसंत सुहावन लागे…

आवन जावन पावन भावन, ज्योतित सूर्य हुआ मतवाला।

मातु करें विनती हम मंगल, गीत सुहावन शब्दन माला।।

हंस विराजित शारद शोभित,पुष्प बसंत लगे ऋतु आला ।

पीत सजावत बाग दिखें सब,ज्योतित होवत पुंज उजाला।।

(मत्तगयंद_सवैयाछंद)

बसंत पंचमी का दिन अपने आप में खास होता है। इस दिन से सूर्य अपनी किरणों में  सौम्य ऊष्मा घोल देता है।लड्डू गोपाल जी के ठंड वाले वस्त्रों को कम कर दिया जाता है । आकाश हल्का नीला और धरती सुनहरी लगने लगती है। खेतों में सरसों के फूल ऐसे लहराते हैं मानो धरती ने पीली चूनर ओढ़ ली हो। हवा में एक मीठी-सी गंध घुल जाती है, जो मन को भी हल्का और प्रसन्न कर देती है।

इसी पीतमय वातावरण में ऋतुराज बसंत अपने पूरे वैभव के साथ प्रवेश करते हैं। पेड़-पौधे, जो कल तक निस्तेज से थे, आज नई कोंपलों से भर उठते हैं। हर डाल पर जीवन का उत्सव दिखाई देता है। आम की बौर, अमलतास की पीली झालर और खेतों की सरसों—सब मिलकर प्रकृति की आरती उतारते प्रतीत होते हैं।

बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, चेतना का उत्सव है। इसी दिन माँ सरस्वती का स्मरण स्वतः ही हृदय में उतर आता है। श्वेत वस्त्रों में, शांत मुखमंडल के साथ, वीणा धारण किए माँ मानो इसी बसंत की गोद में विराजमान हों। उनके आशीष से विचारों में शुद्धता आती है, वाणी में मधुरता और मन में विवेक का प्रकाश फैलता है। पीला रंग यहाँ केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि ज्ञान, आशा और नवसृजन का प्रतीक बन जाता है।

यह दिन हमें सिखाता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर के जड़त्व को छोड़कर नए विचार, नई ऊर्जा और सकारात्मकता को अपनाए। बसंत पंचमी हमें जीवन को फिर से खिलने का अवसर देती है—बिलकुल सरसों के उन पीले फूलों की तरह, जो ठंड के बाद भी मुस्कुराना नहीं भूलते।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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