श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६३ ☆ देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆
अभी तक तो लोग कुर्सी ना मिलने पर परेशान रहते थे, अब तो किसी को टूटी कुर्सी मिल जाने से ही बेहद परेशानियां होने लगी हैं। मीडिया कुछ दिन से लेकर चर्चा कर रहा है। हमने भी घर की सब कुर्सियां बढ़ई से चेक करवा ली हैं। यदि गलती से कोई मेहमान आ गए और कुर्सी कुछ गड़बड़ हो तो नाहक बेज़्ज़ती हो जाएगी।
अब तो घर के बाहर कहीं भी किसी कार्यालय आदि में जाते है, तो कुर्सियों पर ही नज़र रहती हैं। कल एक राज्य सरकार के कार्यालय में जाना हुआ, तो वहां आगंतुकों के लिए रखी हुई उपरोक्त कुर्सियों का चित्र खींच लिया।
हमारी सरकारी पाठशाला में भी कुर्सियों की कील निकल जाती थी। अनेकों बार पेंट में अल ( L) आकर का चीरा लग जाता था। उस जमाने में रफ़ूगर से उसे दुरस्त कर उपयोग लिया जाता था। आजकल तो तुरंत नई पेंट ऑनलाइन दस मिनिट में उपलब्ध हो जाती हैं।
आज के युग में तो अधिकतर प्लास्टिक की कुर्सियों का चलन हो गया हैं। उसमें कील लगने का खतरा भी नहीं रहता हैं। हमने भी बैंक की नौकरी में आरंभ लकड़ी की कुर्सियों से ही किया था। कैशियर की कुर्सी सामान्य से अधिक ऊंची होती थी। समय के साथ गोदरेज की केन वाली कुर्सियां चलन में आ गई। बिना हैंडल वाली बैठने की “यू” आकर की कुर्सी बड़ी आरामदायक होती थी। पीठ और बैठने के स्थान पर केन होने से शरीर को हवा भी मिलती रहती थी।
कंप्यूटर युग में पहिए लगी हुई कुर्सियां आ गई हैं। एक सीट से दूसरी सीट तक जाने के लिए उठने की आवश्यकता भी नहीं हैं। शरीर को और आलसी बनाने में सहायक भी हैं। अधिकारियों की श्रेणी के अनुसार कुर्सी का बजट भी होता हैं। जितना बड़ा अधिकारी होगा, उतनी ही महंगी कुर्सी पर बैठेगा।
अब लेखनी को विराम देता हूं, कुर्सी पर बैठ कर मोबाइल में लिखते लिखते थक जो गया हूं।
© श्री राकेश कुमार
संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)
मोबाईल 9920832096
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





