डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘वैचारिकी – गांधी और हम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२१ ☆
☆ आलेख ☆ वैचारिकी – गांधी और हम ☆
गांधी जी की 78 वीं पुण्यतिथि आयी और गुज़र गयी। मालाएं चढ़ गयीं, चित्रों की पोंछा-पांछी हो गयी, भाषण हो गये, ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ का गायन हो गया। वैसे कुछ दिन पहले पटना में जब उनका भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाया गया तो कुछ लोगों ने ‘ईश्वर’ के साथ ‘अल्ला’ का नाम जोड़ने पर आपत्ति की। नतीजतन भजन की गायिका को क्षमा मांगनी पड़ी। यह दिखाता है कि हम गांधी के ज़माने से कितना आगे बढ़ आये हैं। यहां अब ईश्वर और अल्लाह का एक साथ गुज़र मुश्किल हो गया है।
गांधी अब हमें बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। कहीं उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ माने जाने पर ऐतराज़ है, तो कहीं उन पर देश का विभाजन मंज़ूर करने का इल्ज़ाम लगाया जाता है, जब कि विभाजन के मुद्दे पर गांधी जी द्वारा कहे गये शब्द सर्वविदित हैं। इसीलिए वे आज़ादी के जश्न में शामिल नहीं हुए थे। उस वक्त वे बंगाल के दंगाग्रस्त इलाकों में घूम रहे थे। कुछ समझदार लोग 1947 में मिली आज़ादी को आज़ादी नहीं मानते क्योंकि उनकी नज़र में वह ‘भीख’ में मिली थी। असली आजादी वह है जो युद्ध के द्वारा मिले।
दो-तीन वर्ष पहले देखा कि 30 जनवरी को एक साध्वी ने गांधी के चित्र पर तीन गोलियां चलाकर मिठाई का वितरण किया। साध्वी जी के विरुद्ध इस जघन्य अपराध के लिए क्या कार्यवाही हुई इसका पता नहीं, लेकिन अपना सिर शर्म से ज़रूर झुक गया। मनाया कि देश से बाहर किसी ने इस शर्मनाक दृश्य को न देखा हो।
गांधी के व्यक्तित्व ने दुनिया पर क्या असर डाला यह इस बात से सिद्ध होता है कि दुनिया के 84 देशों में गांधी जी की 110 से अधिक मूर्तियां हैं। इनमें रूस और चीन भी शामिल हैं। इनमें से 8 मूर्तियां अमेरिका में और 11 जर्मनी में हैं। ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, इटली, ब्राज़ील, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, इराक, इंडोनेशिया, फ्रांस, मिश्र, जापान, कुवैत, नेपाल, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, कतर, सऊदी अरब, श्रीलंका आदि देशों में भी बापू की मूर्तियां स्थापित हैं।
ताज्जुब होता है कि दूसरे देशों के लोग एक विदेशी सामान्य नागरिक की प्रतिमा को कैसे बर्दाश्त कर रहे हैं। गांधी के अपने देश में कभी उनकी मूर्ति का चश्मा तोड़ दिया जाता है, कभी नाक तोड़ दी जाती है, कभी काला-नीला रंग पोत दिया जाता है। मूर्तियों के रख-रखाव में अधिकारियों को पसीना आ रहा है। यहां अपने महापुरुषों को संभालना मुश्किल हो रहा है, बाहरी विभूतियों की मूर्तियां कौन संभालेगा? बांग्लादेश में भी जनता अपने महानायक की मूर्ति की कपाल- क्रिया कर रही है।
बापू के प्रशंसक और अनुयायी पूरे विश्व में रहे हैं। नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) उनके अनुयायी थे। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने उनके विषय में लिखा—‘अगली पीढ़ियों को विश्वास करना कठिन होगा कि ऐसा हाड़-मांस का व्यक्ति कभी पैदा हुआ।’ जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से पूछा गया कि वे किस दिवंगत या जीवित व्यक्ति के साथ डिनर करना पसंद करेंगे तो उन्होंने महात्मा गांधी का नाम लिया, जो उनकी नज़र में ‘रियल हीरो’ थे।
उनकी महानता के बारे में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन का कथन था, ‘यदि इतिहास आपका निष्पक्ष मूल्यांकन कर सका तो वह आपको ईसा और बुद्ध की कोटि में रखेगा।’
ध्यान देने की बात है कि गांधी जी ने देश की आज़ादी उन अंग्रेज़ों के जबड़े से छीनी जिनके राज में सूरज नहीं डूबता था, जिन्होंने नवाब वाजिद अली शाह, महारानी लक्ष्मीबाई और बहादुर शाह ज़फ़र का घोर अपमान कर सत्ताच्युत किया था। बड़े-बड़े राजा उनके दरबार में कोर्निश बजाते थे। उन्हें ही एक फ़कीर के अहिंसक आंदोलन के आगे हथियार फेंकने पड़े।
1931 में गांधी जी की सम्राट जार्ज पंचम से बकिंघम पैलेस में मुलाकात ऐतिहासिक थी। गांधी जी वही अपनी घुटनों तक धोती और शॉल की वेशभूषा में थे। उन्होंने पश्चिमी वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया था। भेंट के बाद जब संवाददाताओं ने उनकी पोशाक के बारे में प्रश्न किये तब गांधी ने हंसकर जवाब दिया, ‘वह (सम्राट) हम दोनों के हिस्से के कपड़े पहने थे।’
गांधी एक करिश्मा थे। उन्होंने हमारे देश के लिए जो किया वह दैवी प्रेरणा के बिना संभव नहीं हो सकता। हमारा देश खुशकिस्मत है कि यहां गांधी ने जन्म लिया, अन्यथा शायद हम आज़ादी की सुबह न देख पाते।
भारत के इतिहास में गांधी की अमूल्य भूमिका को ठीक से समझने के लिए स्कूली बच्चों को उनकी आत्मकथा पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। सिर्फ मूर्तियां खड़ी करना और भाषण देना पर्याप्त नहीं है। हम गांधी के प्रति इतनी कृतज्ञता तो दिखा ही सकते हैं कि अकृतज्ञता के सबूत न दें। वैसे गांधी ने दिखा दिया है कि वे हमारी कृतज्ञता के मोहताज नहीं हैं।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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धन्यवाद, बिष्ट जी।