श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६७ ☆ देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆
डोकरी की चाय हो या डोकरे की चाय, इस को बेचने वाले फुटकर दुकानों ने भी नए से नए नाम रख लिए हैं। गुलाबी नगर जयपुर में एक चाय की दुकान “आर ए एस चाय वाला” लिखा हुआ था, हमने उसके मालिक से पूछा इस का क्या तात्पर्य होता है ?
वो तुनक कर बोला “आई ए एस” चाय वाले से जाकर पूछो ? उसकी दुकान पर अपनी मित्र मंडली के साथ चाय पीने का कार्यक्रम था। दुकानदार ने एक और बाण छोड़ दिया। कि ये “एम बी ए” चाय वाला ब्रांड अपनी फ्रेंचाइजी पूरे देश में खोल रहा हैं, हमारे नाम पर प्रश्न क्यों ?
चाय की छोटी छोटी दुकानों को भी अब नाम की क्यों आन पड़ी ? समय ही ऐसा चल पड़ा है, खाद्य वस्तुएं जैसे आटा, बेसन, चावल, सत्तू इत्यादि भी अब ब्रांड के टैग से विक्रय किए जा रहें हैं।
दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग पर एक दशक पूर्व तक अनेक चाय की गुमटियां हुआ करती थी, अब सब बंद हो चुकी हैं। एक कप चाय के लिए भी किसी बड़े ढाबे जो अब विशाल रूप लेकर बड़े बड़े होटलों को मात दे रहें है, से ही आपकी च्यास (चाय की तलब) पूरी हो सकती हैं।
स्पष्ट है, साधारण खाद्य वस्तुएं भी बड़े और कॉरपोरेट सेक्टर की झोली में जा चुकी हैं। इसी चक्कर में हमारी दो रुपए की चाय दस रुपए से पंद्रह की हो जाएगी।
© श्री राकेश कुमार
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