श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

।। माँ सरस्वत्यै नमः।।

☆  संजय उवाच # ३२६ शुष्क गले की ओर… ?

कुछ दिन पहले राजस्थान के ग्रामीण अंचल में परिवार के एक विवाह समारोह में जाना हुआ। यह मेरा पैतृक प्रदेश है। परदेसी हो जाने पर भी यहाँ का सांस्कृतिक वैभव, माटी की सोंध, खान-पान का स्वाद और उसका सुवास भीतर गहरे तक बसे हैं। बचपन में देखे धूल उड़ाते टीबे या बालू के टीले अब दिखाई नहीं देते पर स्मृतियों पर धूल अभी नहीं जमी नहीं है। 

स्मृतियों की इस मधुर शृंखला को तब एकाएक झटका लगा, जब पैर से आकर कुछ टकराया। दृष्टि झुकी तो हतप्रभ रह गया। पैरों में मिनरल वाटर की एक सीलबंद बोतल पड़ी थी।

हुआ यूँ कि समारोह में विविध प्रकार के व्यंजनों के काउंटर लगे थे। एक काउंटर पर हजारों की संख्या में मिनरल वाटर की 200 मिलीलीटर वाली बोतलें थीं।

देखता हूँ कि कुछ बच्चे काउंटर से पानी की सीलबंद बोतल लेकर उन्हें खोले बिना, उनसे फुटबॉल खेल रहे हैं। मैं जड़वत हो गया। पानी को सिर नवाने वाला समाज, पानी को पैरों से ठोकर लग रहा है।

स्मृतिचक्र फिर बचपन में ले गया। पिताजी सेना में थे। उनका, भारत के विभिन्न राज्यों में स्थानांतरण होता रहता। हमारी वार्षिक छुट्टियों में माँ, हमें हमारे ननिहाल लेकर जाती। सामान्यतः यह विवाह का भी मौसम हुआ करता। इस अवधि में अनेक विवाह समारोहों में जाने का अवसर मिलता।

आज से लगभग पाँच दशक पूर्व के इन समारोहों में रामझरे से पानी से पिलाया जाता। रामझरा पानी संग्रह करने का लोटेनुमा पर आकार में बड़ा पात्र होता है, जिसमें जल पिलाने के लिए एक नली भी लगी होती है। उन दिनों काँसे से बने रामझरे उपयोग में लाए जाते थे। हमें पानी हथेलियों को आपस में जोड़कर चुल्लू से पीना होता था। राजस्थान में इसे ओक से पीना कहते हैं। हथेलियों को ठीक से बंद नहीं कर पाते तो बुज़ुर्गों से डाँट पड़ती कि पानी बर्बाद नहीं किया जा सकता।

नीति कहती है, ‘अति सर्वत्र वर्ज्येत।’ अति अंततः संकट का कारण बनती है।  मरुधरा में पानी को ठोकर लगाई जा रही है। पंचतत्वों में से एक है पानी। मनुष्य पंचतत्वों से बना है। मनुष्य पंचतत्वों को नष्ट करने पर तुला है। भावार्थ है कि मनुष्य भस्मासुर हो चला है।

बच्चों को मीठी झिड़की दी। पानी की  बोतलें एक स्थान पर जमा करने के लिए कहा। बच्चे खेल बंद करके भाग गए।

प्रश्नों से दूर भागने से प्रश्न समाप्त नहीं होते। विकास हो, वस्तुएँ उपलब्ध हों, सुविधा बढ़ें, यह सहज मानवीय भाव है पर विपुलता, जीवनावश्यक तत्वों का अपव्यय करे तो यह आशंका को जन्म दे सकता है। स्मरण रखा जाना चाहिए कि इसी अपव्यय के चलते जोहानिसबर्ग, विश्व में पहला बिना पानी का शहर होने के मुहाने पर है।

सिगरेट और अन्य तंबाकूयुक्त पदार्थों पर वैधानिक चेतावनी छपी होती है कि उनका सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। सोचता हूँ, समय आ गया है कि  मिनरल वॉटर की बोतलों पर छपा हो कि पानी की एक भी बूँद का अपव्यय, शुष्क गले की ओर एक क़दम है।

शेष चिंतन और आचरण अपना-अपना।

© संजय भारद्वाज 

प्रातः 3:29 बजे 28 फरवरी 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments