श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।

पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।

 स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।

 हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।

 हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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