श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २८२ ☆ नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव… ☆
शारदीय आकाश की कोमल आभा के साथ ही मन में एक दिव्य अनुभूति जाग उठती है—माँ के आगमन की। नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, श्रद्धा और सृजन का उत्सव है, जहाँ सम्पूर्ण सृष्टि अपनी जननी के स्वागत में नत होती है।
इस पावन आरंभ में जवारे बोने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। मिट्टी में डाले गए ये बीज केवल अन्न नहीं, बल्कि आशा, उर्वरता और नवजीवन के प्रतीक होते हैं—मानो माँ के आशीष से जीवन हरा-भरा हो उठे।
“पूजन करते भक्त, जवारे बो कर मैया,
खुशहाली चहुँओर, मिले हम सब को छैया।”
इन पंक्तियों में जनमानस की वही प्रार्थना है, जो हर हृदय में धड़कती है।
भारतीय संस्कृति में नारी को सदा “शक्ति” माना गया है। नवदुर्गा के नौ स्वरूप हमें याद दिलाते हैं कि नारी केवल सृजन ही नहीं, बल्कि संरक्षण और परिवर्तन की आधारशिला भी है। आज की नारी हर क्षेत्र में अपने सामर्थ्य का परिचय देते हुए अपने भीतर की दुर्गा को जागृत कर रही है।
जब एक स्त्री घर, समाज और अपने स्वप्नों को संवारती है, तब वह केवल जीवन नहीं जीती—वह सृजन करती है। यही उसकी सच्ची “सृजनधर्मिता” है, जिसे नवरात्रि का यह पर्व और अधिक उजागर करता है।
“हरीभरी हो गोद, यही माँगे जन सारे,
शेर सवारी दिव्य, मातु वर दायक धारे।”
इन भावों में माँ के प्रति विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि की कामना सहज ही झलकती है।
नवरात्रि हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति की पूजा केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि हर नारी के सम्मान में होनी चाहिए। यही सच्ची आराधना है।
माँ दुर्गा का यह पावन पर्व हम सभी के जीवन में सुख, शांति और नवसृजन का प्रकाश भर दे—
जय माता दी।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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