श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३७ क्रोध… ?

चैनल पर समाचार देख रहा हूँ। दुकानदार द्वारा दस रुपये मांगने पर क्रोधित युवक ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। समाचार सुनकर हतप्रभ हूँ, अवाक हूँ। कुछ लोग विचार कर सकते हैं कि केवल दस रुपए के लिए कोई इतनी हिंसा कैसे कर सकता है? मेरे सामने प्रश्न दस रुपये या दस लाख या दस करोड़ का नहीं, मनुष्य के क्रोध के पारावार का है। जो मारा गया वह मनुष्य था, जिसने मारा, वह मनुष्य है। सत्यस्थिति तो पुलिस की विवेचना से सामने आएगी तथापि प्रथम दृष्टया यह षड्यंत्रपूर्वक की गई हत्या नहीं लगती। इसके मूल में क्रोध के चलते अपना आपा खो देना दिखता है।

क्रोध मनुष्य की प्राकृतिक भावना है। मनुष्य के भावनात्मक विरेचन के लिए भी क्रोध अनिवार्य है। तथापि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्र अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए। क्रोध का अतिरेक सामान्य विवाद को हिंसक दुर्घटना में बदल सकता है।

प्रश्न है कि क्रोध क्यों उपजता है? मनोविज्ञान कहता है कि सामान्यत: अपेक्षा-भंग, असंतोष, असहिष्णुता, असफलता, असुरक्षा, असहायता के चलते क्रोध उपजता है।

योगेश्वर, श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय के बासठवें श्लोक में क्रोध के संबंध में कहते हैं,

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

योगेश्वर उवाच अगले श्लोक में इसी विषय को विस्तार देता है-

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहत्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और ज्ञानशक्ति का नाश हो जाने से मनुष्य अपनी स्थिति से, अपनी मनुष्यता से गिर जाता है।

क्रोध के चलते मनुष्यता से गिरा मनुष्य, कैसे अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है, इसका उल्लेख अपनी एक लघुकथा ‘क्रोध में किया था। लघुकथा इस प्रकार है-

“…दोनों में बहस होने लगी थी। विवाद की तीक्ष्णता बढ़ती गई। आक्रोश में दोनों थे पर पहला मनुष्य था, दूसरा क्रोधी था। क्रोध, तर्क का पथ तज देता है, मर्म को चोट पहुँचाने की राह चलता है। इस राह के एक विनाशकारी मोड़ पर तिलमिलाहट टकराती है।

तिलमिलाहट में क्रोधी ने एक बड़ा पत्थर मनुष्य के सिर पर दे मारा। मनुष्य की मौत हो गई। क्रोधी को फाँसी चढ़ना पड़ा।

यश, संपदा, नेह, संबंध, अंततः समूचे अस्तित्व की बलि ले लेता है क्रोध।”

आज के मनुष्य का अनुभव बताता है कि बदलती जीवन शैली में अब अहंकार से भी क्रोध उपजने लगा है। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स या श्रेष्ठता बोध, अहंकार के मूल में होते हैं।

इस लघुकथा को लेख के आरंभ में उल्लेखित घटना से जोड़ें। जिसकी हत्या हुई, उसका जीवन असमय नष्ट हो गया। जिसने हत्या की, उसका जीवन भी नष्ट होने की स्थिति में आ गया है।

लोकोक्ति है कि क्रोध वह अग्निकुंड है जो आपके हाथों स्वयं आपकी आहुति करवा देता है।

अपनी आहुति या अपने क्रोध पर नियंत्रण? निर्णय हरेक को अपने स्तर पर लेना है।

© संजय भारद्वाज 

(16:55 बजे, 30 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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