श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३९ तादात्म्य… ?

प्रकृति के चौरासी लाख प्राणियों में एक अदृश्य तादात्म्य है। इस तादात्म्य को हर सजीव अनुभव  करता है। इस अनुभूति की तीव्रता परिवेश के आधार पर कम या अधिक हो सकती है। इस तादात्म्य से जुड़ी कुछ घटनाओं का स्मरण हो रहा है।

उस दिन दर्शन के बाद मैं मंदिर से बाहर निकला। सीढ़ियों पर बैठकर जूते के फीते बाँध रहा था। स्पोर्ट्स शूज़ थे, फलत: फीते अधिक लंबे थे और बाँधने की प्रक्रिया में कुछ समय लग रहा था। एक जूता बाँधने  के बाद गरदन ऊपर उठाई तो देखता हूँ कि भूरे रंग का एक श्वान मुश्किल से एक हाथ की दूरी पर आकर खड़ा है। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे निशब्द देख रहा है। मैंने उसकी आँखों में तैर रहे भावों को पढ़ने का प्रयास किया। फिर स्नेह से पूछा, “क्या बात है? कोई परेशानी है?” वह और निकट आया और अपना चेहरा मेरे घुटनों के पास रगड़ने लगा। मेरे घुटनों के नीचे अपना सिर डालने का प्रयास करने लगा। मैंने प्रेम से उसे अपने पास लिया। उसके चेहरे के बाएँ हिस्से को कुछ देर सहलाया। वह पूँछ हिलाते हुए उसका आनंद लेता रहा।

फिर उससे कहा कि अब दाईं तरफ का चेहरा ला। भाषा से अधिक भाव और संकेत समझ में आते हैं। अब उसके चेहरे का दायाँ भाग सहलाया गया। उसकी पीठ थपकाई और थपथपाई भी।

उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव थे। मैंने कहा, “तेरा काम हो गया न! अब जा।” वह थोड़ी दूर जाकर बैठ गया।

तादात्म्य का ऐसा ही अनुभव प्रचंड ट्रैफिक वाली एक सड़क को पार करते समय आया था। ट्रैफिक कम होने की प्रतीक्षा में जब मैं खड़ा था, मेरे साथ आकर एक श्वान खड़ा हो गया। हम दोनों की आँखें मिली। केवल आँखें मिलने तक मामला नहीं रुका। उसने मेरे साथ कदमताल की और सड़क पार हो गया।

अनुभवों की शृंखला में किसी शिकारी प्रजाति-सी खूँखार दिखती पूरी काली देह और उसमें काँच-सी चमकती पीली आँखों वाली बिल्ली भी याद हो आई। पार्क और एक सरकारी पाठशाला के बीच की साझा दीवार के पास बैठी वह मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थी। फिर उछल-उछल कर म्याऊँ-म्याऊँ कर अपने पंजे मेरे पैरों पर टिका कर कुछ कहने लगी। उसके उछलने से मैंने अनुमान लगाया कि वह उस ऊँची दीवार पर जाना चाहती है। संभव है कि उस पार उसके बच्चे हों। मैंने उसे पुचकार कर धीरे से उठाकर दीवार पर बैठा दिया। उसकी म्याऊँ-म्याऊँ में अब धन्यवाद का भाव था।

प्रसिद्ध साहित्यकार अनातोले फ्रांस ने कहा था कि मनुष्य की आत्मा का एक अंश तब तक सुप्तावस्था में रहता है, जब तक वह किसी पशु या पक्षी से प्रेम नहीं करता। बिल्ली विशेषज्ञ पशु चिकित्सक डॉ. लुईस जे कम्युटी ने लिखा है, “बाई लविंग एंड अंडरस्टैंडिंग एनिमल्स, परहेप्स वी ह्यूमेन शेल कम टू अंडरस्टैंड ईच-अदर।” पशुओं से स्नेह करना और उन्हें समझना, हमें एक-दूसरे को व्यापक स्तर पर समझने में सहायक होता है।

प्रकृति के जीवों में परस्पर तादात्म्य के मूल में एक समान आवश्यकताएँ रही होंगी। यह तादात्म्य एक-दूसरे के प्रति संवेदना जगाता है, करुणा उपजाता है। साथ ही एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी पर हमला करने पर अपनी सुरक्षा का भाव या प्रत्याक्रमण भी उतने ही तेजी से जगाता है।

जो भी हो लेकिन प्रकृति के विशाल और विस्तृत परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मनुष्य का तादात्म्य उसे असीम आनंद और विशेष दृष्टि प्रदान करता है। इस दृष्टि पर अपने-अपने अनुभव के आधार पर हरेक का अलग-अलग मत हो सकता है। तथापि मत-मतांतर के परे यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव जाग्रत रहे तो जगत अधिक सुंदर और अधिक आत्मीय बन सकता है।

 

© संजय भारद्वाज 

15:17 बजे, 6.6.2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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