डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ऑनर किलिंग। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन चढी नाम खुमारी / स्वर- विभा जी योगाश्रम, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२५ ☆

☆ ऑनर किलिंग… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘ऑनर किलिंग’ विपरीतार्थक शब्द…’सम्मानपूर्वक मृत्यु’ अर्थात् समाज का एक घिनौना सत्य…जो सदियों से हर जाति, हर मज़हब के लोगों में प्रचलित है। प्रश्न उठता है, ‘आखिर यह प्रथा आई कहां से?’ शायद! इसका जन्म हुआ–मानव में निहित सर्वश्रेष्ठता के भाव से, उसके अहं व उसके ग़ुरूर से। यह दुर्भावना, वह दूषित व घृणित भाव है, जो मानव को मानवता से कोसों दूर ले जाता है। उसकी संवेदनाएं मर जाती हैं और वह ठूंठ मात्र रह जाता है, क्योंकि संवेदनशून्य व्यक्ति अहंनिष्ठ, हृदयहीन, दैवीय गुणों से विहीन तथा स्नेह, सौहार्द, ममता, त्याग, सहानुभूति आदि की भावनाओं से बहुत दूर होता है। ऐसा अहंलीन मानव दूसरों के अस्तित्व को नगण्य समझता है। परंतु वह घर-परिवार में एक-छत्र साम्राज्य चाहता है, यहां तक कि वह अपने आत्मजों को भी अपनी सम्पत्ति व धरोहर स्वीकारता है तथा आशा करता है कि वे कठपुतली की भांति उसका हर हुक्म बजा लाएं… उसके हर आदेश की तुरंत अनुपालना करें।’ नो’ व ‘असंभव’ शब्दों का उसके शब्दकोश में स्थान न हो, क्योंकि उसमें प्रत्युत्तर सुनने का सामर्थ्य-साहस होता ही नहीं। वह शख़्स अजीब होता है…जो अपने से अधिक योग्य, बुद्धिमान, सामर्थ्यवान् व शक्तिशाली किसी दूसरे को समझता ही नहीं।

अक्सर सब परिजन उसकी अमुक प्रवृत्ति से सदैव परेशान रहते हैं। उसके घर आते ही बच्चे इधर-उधर छुप जाते हैं और पत्नी का चेहरा भी भय से कुम्हला जाता है, क्योंकि वह नहीं जानती, कब वह किस बात पर क्रोधित हो; उस पर अकारण बरसने लगे? और उसके माता-पिता भी सदैव उसके व्यवहार के प्रति आशंकित रहते हैं, क्योंकि वह किसी भी पल मर्यादा की सीमाओं का अतिक्रमण कर किसी को भी कटघरे में खड़ा कर सकता है।

चलिये! अब बच्चों की नियति पर चर्चा करते हैं… किस मन:स्थिति में वे उस घर में रहते हैं, जहां पिता…पिता नहीं, एक हिटलर की मानिंद सदैव कटु व्यवहार करता है। बच्चों को वह अपनी जायदाद समझता है और उन्हें अपने अंकुश में रखना चाहता है। बच्चों को विवशता के कारण उसकी हर ग़लत बात को सही कहना पड़ता है, क्योंकि प्रतिपक्ष की दलील सुनने का धैर्य उसमें होता ही नहीं। बच्चे उसे अपनी नियति स्वीकार सुंदर कल की कल्पना में खोए रहते हैं कि आत्म-निर्भर होने के पश्चात् उन्हें वह सब सहन नहीं करना पड़ेगा।…वे निरंकुश व स्वछंद हो जाएंगे तथा अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने में स्वतंत्र होंगे।

परंतु समय से पूर्व, यदि बेटा या बेटी किसी को चाहने लगता है; प्रेम करने लगता है, तो सुनामी की गगनचुंबी लहरें उस घर की शांति व अमनोचैन को समाप्त कर देती हैं; लील जाती हैं। सहसा उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है और वह लातों व घूसों पर उतर आता है। बेटी को तो वह घर की चारदीवारी में कैद कर लेता है और उससे मोबाइल आदि भी छीन लिया जाता है। वह मासूम दीवारों से सिर टकराती, आंसू बहाती, बार-बार ग़ुहार लगाती रहती है कि वह उसके साथ अपना जीवन बसर करना चाहती है। वह दिल की गहराइयों से उसे पसंद करती है और उसके बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती। परंतु उसकी आवाज़ बंद कमरे की दीवारों से टकरा कर लौट आती है। यदि वह कभी अपने तथाकथित पिता से जिरह करने का साहस जुटाती है, तो उस पर प्रतिबंध व पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं और कुलनाशिनी, कुलक्षिणी व कुलटा कहकर उसे ही नहीं, उसके माता-पिता को भी प्रताड़ित किया जाता है। जब ज़ुल्मों की इंतहा हो जाती है, तो अवसर पाकर वह उन ज़ंजीरों को तोड़ कर भाग निकलती है, जहां वह अपने हमसफ़र के साथ स्वतंत्रता से सुख की साँस ले सके।

इसके पश्चात् अक्सर उस घर में हंगामा व गाली-ग़लौज़ होता रहता है और वह ज़ालिम हर पल आसमान को सिर पर उठाए धमाचौकड़ी मचाए रहता है। उसके मन में यही ख़लिश रहती है कि यदि वह एक बार उसके सामने आ जाए, तो वह उसे अपनी ताकत का एहसास दिला कर चींटी की भांति मसल कर सुक़ून पा सके। वास्तव में वह पिता होने से पहले हिटलर होता है, जो किसी भी सीमा तक जा सकता है और यही ‘शक्ति-प्रदर्शन’ है– ‘ऑनर-किलिंग।’ लड़की का पिता व परिवारजन, अपने-अपने मान-सम्मान की दुहाई देते हुए उन दोनों की हत्या कर अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने बच्चों को जन्म देकर कोई एहसान नहीं किया और न ही वे गुलाम हैं उनकी सल्तनत के …जिन पर उनका एकाधिकार है। सो! वे उनसे इच्छित व्यवहार व आदेशों की अनुपालना की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं?

प्रेम सात्विक भाव है…प्रेम सामीप्य का प्रतिरूप है तथा एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए उन्हें क़रीब लाने का उपादान है। प्रेम संगीत है…प्रेम उच्छ्वास् है और प्रेम वह पावन भाव है, जो मलय वायु के झोंकों सम शीतलता प्रदान करता है। यह प्रश्न मन में अक्सर कुनमुनाता है कि जन्मदाता बच्चों में प्रेम का भाव प्रकट होते ही उनके दुश्मन क्यों बन जाते हैं? क्या झूठा अहं व मान-सम्मान बच्चों की ज़िन्दगी से अधिक अहमियत रखता है? शायद! उनकी नज़रों में प्रेम करना ग़ुनाह होता है, जिसका मूल्य अथवा ख़ामियाज़ा उनके आत्मजों को अपने प्राणों की बलि देकर ही चुकाना पड़ता है। चलिए! इन कट्टरपंथी दकियानूसी विचारधारा वाले माता-पिता के असामान्य व्यवहार पर दृष्टिपात कर लें। आजकल तो वे स्वयं को ख़ुदा स्वीकारने लगे हैं, क्योंकि वे अपनी इच्छानुसार बच्चों को जन्म देते हैं, अन्यथा भ्रूण-हत्या करवा कर उससे मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं और बच्चों के युवा होने पर उनके हृदय में उफ़नते प्रेम के ज्वार को देख वे उनके शत्रु बन जाते है और झूठी मान-मर्यादा हित आत्मजों के प्राण तक लेने में संकोच नहीं करते। ऐसे सिरफिरे लोगों को जो स्वयं को ख़ुदा से कम नहीं आंकते, क्या नाम देंगे आप?

यह शाश्वत् सत्य आजकल मान्य नहीं है कि जन्म व मृत्यु तो सृष्टि-नियंता के हाथ में है। मानव उसके हाथों का खिलौना- मात्र हैं। वह जितनी सांसें लिखवा कर इस संसार में जन्म लेता है, उससे एक सांस भी अधिक नहीं ले पाता। अरे! यह इक्कीसवीं सदी है… प्राचीन परंपराएं व मान्यताएं बदल गई हैं… सोच भी पहले-सी कहां है? शायद! वह ज़ालिम पिता यह सोचकर फूला नहीं समाता कि वह उसका जन्मदाता था। सो! उसकी हत्या व उसके प्राण लेकर उसने कोई अपराध अर्थात् ग़ुनाह नहीं किया।

विभिन्न प्रदेशों में खापें इस विचारधारा की पक्षधर व पोषक हैं कि युवाओं को अपनी इच्छानुसार विवाह करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। वे कुल-गोत्र व जात-बिरादरी की मर्यादा पर अधिक ध्यान देती हैं और उनकी हत्या करने तक को उचित ठहराती हैं। आश्चर्य होता है यह देख कर कि अनेक वर्ष तक एक छत के नीचे ज़िन्दगी बसर कर रहे पति-पत्नी को, भाई-बहन के रूप में राखी बांधने का फरमॉन स्वीकारना पड़ता है। कभी उन्हें व उनके माता-पिता को जात-बिरादरी व गाँव से निष्कासित कर दिया जाता है, तो कभी उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जातीं हैं।

परन्तु आजकल कुछ सुखद परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। चंद खापों का मृत्युभोज की परंपरा का विरोध करना या विवाह पर डी•जे• न चलाने की पेशकश, दहेज न लेने-देने की मुहिम आदि उनकी सकारात्मक सोच की ओर इंगित करता हैं। परंतु आवश्यकता है… समाज के तथाकथित ठेकेदार, बच्चों को अपनी इच्छानुसार जीवन साथी चयन करने की स्वतंत्रता प्रदान कर उदार-हृदयता का परिचय दें… उनके विरुद्ध मनमाने निर्णय लेकर बेतुके व विचित्र फरमॉन जारी न करें। संविधान ने सबको समानाधिकार प्रदान किए हैं और उन्हें भी अपनी इच्छानुसार जीवन-साथी के वरण करने का अधिकार है। सो! सबको एक-दूसरे की भावनाओं को अहमियत देते हुए समाज में समरसता स्थापित करने का भरसक प्रयास करना चाहिए।

यह अकाट्य सत्य है कि ऑनर किलिंग यदि एक की होती है, तो दोनों परिवार सकते में आ जाते हैं… उनके घर-परिवार में मातम-सा पसर जाता है, क्योंकि वे एक-दूसरे के अभाव में जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह हृदय-विदारक पीड़ा दोनों परिवारों की खुशियों को समूल नष्ट कर देती है तथा सुनामी की लहरों की भांति लील जाती है। प्रेम प्रतिदान का दूसरा रूप है…यह केवल देने का नाम है। सो! यदि समाज के रसूख़दार लोग बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान कर दें तथा मनचाहे जीवन साथी को वरण करने का अधिकार प्रदान करने की पहल करें, तो वे प्रसन्नता से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। सो! उनकी भावनाओं का तिरस्कार न करना ही जीवन की सार्थकता है। आइए! मिलकर जीवन को रोशन करें तथा समाज में नया उजाला फैलाएं। एक स्वर्णिम सुबह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है…सारी सृष्टि उपवन-सी महक रही है, जहां चिर-वसन्त है। हम भी मनोमालिन्य व ग़िले-शिक़वे मिटा कर प्रेम भाव से एक नए युग का सूत्रपात करें, जहां सम्बन्धों की गरिमा व अहमियत हो…हम स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाओं के स्थान पर, अलौकिक प्रेम व अनहद-नाद की मस्ती में खो जाएं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted